“शिक्षा” Shiksha Moral Hindi Story

आज हम बात करने वाले है एक हिंदी ऐतिहासिक कहानी के बारे में जो की “शिक्षा” से जुडी हुई है और मुझे विश्वाश है की शायद आपको यह जरूर पसंद आएंगी। आपको शायद पता ही होगा की शिक्षा का हमारे जीवन में क्या महत्व है और जीवन जीने में यह आपको किस तरह काम में आ सकती है. अगर आपको अच्छी शिक्षा मिली है तो आप जीवन में बहोत ही प्रगति कर सकते है.

यह कहानी बहोत ही लम्बी होने वाली है, क्यों की इससे जुड़े सभी पात्र और किस्सों को अगर हमने संक्षिप्त रूप दे दिया तो शायद आपको इसे पढ़ने में उतना मजा नहीं आएगा। इसी लिए हमें इसे ओरिजिनल रूप में ही रखा है और इसे हमने तीन हिस्सों में विभाजित किया है. इससे आप सभी पढ़ने में और आसानी होगी।

“शिक्षा”

सन् १८४६ में, कई देशी प्रतिष्ठित पुरुपों की सहायता और भारतवन्धु प्रात:स्मरणीय जे.ई डी. बेथून साहब के उद्योग से कलकत्ते में वङ्ग देश की वर्तमान स्त्रीशिक्षा का श्रीगणेश हुआ था। किन्तु उसके बहुत पहले से कलकत्ते के अनेक स्थानों में लड़कियां के स्कूल खोलकर उनमें लड़कियों को पढ़ाने की व्यवस्था की जा चुकी थी। सन् १८२० की वङ्गाल की शिक्षा-सम्बन्धी रिपोर्ट में देखा जाता है कि उस साल की स्कूल-परीक्षा में गरीव . घरों की ४० लड़कियों ने परीक्षा देकर पुरस्कार पाये थे। वालि- काओं की परीक्षा लेने के उपरान्त प्रसन्न होकर राजा राधाकान्त देव वहादुर ने लिखा था “महिला-शिक्षा-समिति के द्वारा शिक्षा पाई हुई लड़कियों की भी परीक्षा ली गई; उनका उच्चारण और फल बहुत ही सन्तोप-जनक पाया गया ।

इसी से अच्छी तरह जान पड़ता है कि इस साल के पहले से ही कलकत्ते में लड़कियों को शिक्षा दी जाने लगी थी। उक्त साल के सन्तोप-जनक फल से उत्साहित होकर महिलासमिति के संचालकों ने शोभावाज़ार, श्याम- बाज़ार, जान वाज़ार और इटाली में चार कन्यापाठशालाएँ और स्थापित की थीं। राजा राधाकान्त देव बहादुर ने महिला-समिति को एक प्रवन्ध लिखकर दिया; उसका हेडिंग था-“खी-शिक्षा-विधायक प्रस्ताव।।

त्रीशिक्षा की उपयोगिता और आवश्यकता समझाने के लिए (और ख़ासकर यह प्रमाणित करने के लिए कि यह काम उच्च श्रेणी के भद्रपुरुषों की रीतिनीति के विरुद्ध नहीं है) वह प्रवन्ध लिखा गया था। प्रातःस्मरणीय सुशिक्षिता आर्यमहिलाओं के नाम का उल्लेख करके श्रीशिक्षा का गौरव दिखलाते हुए उस प्रबन्ध की रचना हुई थी। उसमें उक्त राजा साहब ने लिखा है-“यदि इस स्त्री-शिक्षा को विशेप भाव से उत्साह दिया जाय तो यह समाज का बड़ा कल्याण करेगी। मेरे पास इस “श्री-शिक्षा-विधायक प्रस्ताव की एक प्रति मौजूद है। उससे कुछ अंश यहाँ उद्धृत किया जाता है।- “आजकल की त्रियों में भी देखो। मुरशिदाबाद में वारेन्द्र -श्रेणी की ब्राह्मणी रानी भवानी थी।

उन्होंने लड़कपन में शिक्षा पाई थी। वे राजकाज का सारा हिसाब आप देखती और आप ही सव वन्दोवस्त करती थी। ४ x एक और राढ़-श्रेणी की त्राहाण-कन्या थी। उनका नाम था, हठी विद्यालङ्कार। वे बचपन में काम-काज से फुरसत मिलने पर पढ़ती थीं। धीरे-धीरे वे ऐसी पण्डिता हो गई कि सबको शान पढ़ाने लगीं। काशीवास के समय उन्होंने अनेक बङ्गाली और हिन्दुस्तानी विद्यार्थियों को पढ़ाया। उस समय अन्यान्य अध्यापक पण्डितों की तरह उन्हें भी सभामों में निमन्त्रण मिलता था और वे पण्डितों से शास्त्रार्थ भी करती थीं। फरीदपुर जिले के कोटालीपाड़ा गांव में -श्यामासुन्दरी नाम की एक वैदिक ब्राह्मण की स्त्री ने व्याकरण के उपरान्त सम्पूर्ण न्यायदर्शन पड़ा था।

उनके स्वामी भी महामहो- पाध्याय थे। उनको अपनी आँखों देखनेवाले अभी तक मौजूद हैं। कलकत्ते के शोभावाज़ारवाले राजघराने की सव स्त्रियां लिखना- पढ़ना जानती हैं। इस प्रकार उत्साह पाकर तीन-चार साल तक इस महिला- शिक्षा-समिति का काम खूब चलता रहा। अनेक वालिकाएँ सालाना, छमाही और तिमाही परीक्षा देने के लिए राजा राधाकान्त देव के घर जाती थीं। किन्तु अन्त को अर्थाभाव से यह शुभ कार्य बहुत दिनों तक नहीं चल सका ।

सव सदस्यों का एक सा उत्साह न रहने से, और काफी रुपया खर्च न कर सकने के कारण, प्रारम्भ में ही इस अच्छे काम की इतिश्री हो गई। सन् १८२४ में यह समिति टूट गई। पचीस वर्ष बाद महात्मा येथून के आने से फिर स्त्रीशिक्षा का काम शुरू हुआ। बथून खोजाति के बड़े ही शुभ- चिन्तक और कृतज्ञ थे। उन्होंने मन-वाणी-कायासे वङ्ग ललनाओं का हितसाधन करना अपना व्रत बना लिया। जिस काम का जैसा गुरु होता है वैसा ही शिप्य भी मिल जाता है, और यही कार्यसिद्धि की सूचना समझी जाती है। वेथून साहब लाट साहब की सभा कं व्यवस्था-सचिव थे।

लम्बी-चौड़ी ख़ासी तनख्वाह पाते घे। इज्ज़त भी उनकी बड़े लाट के बरावर ही थी। किन्तु व्यव- हार में वे बहुत ही निष्कपट और सीधे आदमी थे। उनके पास जा- कर बातचीत करके कोई यह न जानता था कि किसी अफसर से वातचीत कर रहे हैं। यही जान पड़ता था कि किसी अपने बड़े या गुरुजन से बातचीत कर रहे हैं। परोपकारपरायण येथून साहब वङ्गललनाओं को सुशिक्षा देने के लिए अग्रसर हुए। किन्तु उन्हें प्रेरणा करनेवाले इस ओर आकृष्ट करनेवाले अमरकीर्तिशाली विद्यासागरजी ही थे। इसी समय विद्यासागर को एक बार हुगली, ढाका, कृष्णनगर और हिन्दू-कालेज के सीनियर परीक्षा देनेवाले विद्यार्थियों का बंगला का पर्चा वनाना पड़ा।

विद्यासागर ने उस पर्चे का विपय “बीशिक्षा की आवश्यकता रक्खा । परीक्षा में कृष्णनगर-कालेज के नीलकमल भादुड़ी का लेख सर्वोत्तम ठहरा और उन्हीं को स्वर्णपदक मिला । यह लेख उस समय के अख- बारों में और शिक्षाविभाग की रिपोर्ट में छपा था। पारितोषिक देने के समय सभा में खौशिक्षा के परम प्रेमी वेथून साहब उपस्थित थे। उन्होंने एक उत्साह-पूर्ण वक्तृता-द्वारा उपस्थित सज्जनों को इस शुभ कार्य के लिए उत्तेजित भी किया था।

शिक्षा-प्रचार के अच्छे प्रवन्ध तथा बङ्गाल में जगह-जगह अँगरेज़ी और बँगला के स्कूल खुलवाने के लिए विद्यासागरजी अक्सर वेथून साहय के यहाँ आया-जाया करते थे। बेथून साहब का विद्यासागर से बड़ा हेल- मेल हो गया था। वेथून साहब उस समय की शिक्षा समिति के प्रेसीडेण्ट थे।

विद्यासागरजी उससे पहले ही पढ़ाई समाप्त करके कामकाज करने लगे थे। उस समय विद्यासागर पर मार्शल, मायेट आदि शिक्षा- विभाग के प्रतिष्ठित कर्मचारी ऐसी श्रद्धा रखते थे कि कोई भी काम उनसे सलाह लिये विना न करते थे। बहुत ही थोड़े दिनों में विद्या- सागर और बेथून की ऐसी दाँत-काटी रोटी होने का यह भी एक कारण है। वेथून और विद्यासागर की मैत्री ने ही बङ्गाल में स्त्री- शिक्षा का ऐसा ज़ोरदार प्रचार कर दिया है।

विद्यासागर का स्वभाव ही था कि वे जिस काम में हाथ लगाते थे उसे पूरा करने के लिए तन, मन, धन, मान, सुख और सम्पत्ति सब कुछ त्याग करने को तैयार रहते थे। उनके बन्धुवान्धव भी उनके इस स्वभाव को गुण समझते थे। विद्यासागर और उनके इष्टमित्रगण सैकड़ों विघ्न-बाधाओं की परवा न करके बेथून साइव के वालिकाविद्यालय की श्री-वृद्धि करने के लिए अग्रसर हुए। इस कार्य में सहायता करने के कारण राजा दक्षिणारजन, स्व० मदनमोहन तर्कालङ्कार, पण्डित शम्भुनाथ, स्व. रामगोपाल चाप आदि बहुत से सम्माननीय लोगों को समाज-कृत निग्रह भोगना पड़ा था। इन लोगों में से हर एक ने इस काम में इतनी सहायता की थी कि हर एक को बेथूनविद्यालय का संस्थापक कह सकते हैं।

इन लोगों ने अपनी बालिकाओं को उक्त स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा, और उसके लिए अनेक लाञ्छनाएँ भी सहीं । तर्का- लङ्कारजी को कुछ अधिक उपद्रव सहने पड़े थे। उन्हीं ने सबसे पहले अपनी दो लड़कियों को स्कूल में पड़ने के लिए भेजा था। उस समय के अखबारों ने भी इन लोगों पर बड़े कड़े लेख लिखे थे।

बेथून साहब ने विद्यालय स्थापित करके उसका प्रबन्ध विद्या- सागर को सौंपा। विद्यासागर ने, मित्र के अनुरोध से, विद्यालय की देखरेख और उन्नति करने का काम स्वीकार कर लिया। विद्या- सागर के साथ येथून साहय अक्सर स्कूल देखने आया करते थे । डेविड हेयर की तरह येथून साहब भी जब स्कूल देखने जाते तब लड़कियों के लिए तरह-तरह की खेलने की चीजें ले जाया करते थे।

विद्यालय में जाकर बालिकाओं को खिलाने देते और लड़कों की तरह उनके साथ खेलते थे। मदनमोहन तर्कालङ्कार के जीवनचरित में विद्याभूपण महाशय लिखते हैं-“ये प्रायः अपने घर जाते समय भुवनमाला और कुन्दमाला नाम की तर्कालङ्कार महाशय की लड़कियों को गोद में लिया करते थे और कभी-कभी उन्हें अपने बंगले पर भी ले जाते थे। उन लड़कियों के ऊधम और उपद्रवों को भी बेथून साहब सह लेते थे।

भुवनमाला और कुन्दमाला वेथून की इतनी दुलारी थी; इसी से लेडी डलहौसी आदि को भी बहुत प्यारी थी।” इस प्रकार विद्यालय का काम अच्छी तरह चलने लगा । वेथून साहब की पृष्ठपोपकता और विद्यासागर के यत्न से थोड़े ही दिनों में विद्या- लय की इमारत बनाने के लिए चन्दा होने लगा। इतने दिनों तक विद्यालय का खास मकान नहीं था। विद्यालय के प्रधान उद्योगी दक्षिणारजन मुखोपाध्याय के घर में पढ़ाई होती थी।

स्थान कम होने के कारण कुछ दिनों बाद वेथून-विद्यालय गोलदीघी के पास उठकर चला गया था। वेथून साहब ने खुद बालिका-विद्यालय की इमारत के लिए बहुत-सा धन दिया था। पहले बिना फीस लिये, फिर कुछ फीस लेकर, पढ़ाई होती रही । मास्टरों को तनख्वाह भी अच्छी देनी पड़ती घो। वह खर्च भी वेथून साहब के ज़िम्मे था। लड़कियों को लाने और पहुँचा पाने के लिए गाड़ियाँ थीं। उनका भी खर्च भला-चङ्गा था। करीब-करीब सभी खर्च अपने सिर लेकर येथून साहब इस विद्यालय की सहायता करते रहे।

सन् १८५१ में, बरसात के समय, गङ्गा के उस पार ४।५ कोस नाई गाँव के बहुत से के अनुरोध से वहाँ का वालिका- विद्यालय देखने के लिए वेथून साहब गये। रास्ते में भीगते हुए कीचड़ मँझाकर वहाँ पहुँचे। सहसा वहाँ उन्हें बुखार आ गया और उसी में उनकी मृत्यु भी हो गई। वेथून साहब के वियाग से व्याकुल विद्यासागर वालकों की तरह रोने लगे थे। भारत के परम वन्धु और वङ्गललनायों के हितैपी येथून साहब के स्वर्गवास से विद्या- सागर बहुत दिनों तक निरुत्साह-से वने रहे। उसके बाद बेथून- साहव के वालिका-विद्यालय की उन्नति के लिए उन्होंने वहुत परिश्रम, उद्योग और खर्च किया।

अन्त को अनेक प्रकार के मत-भेद होने के कारण विद्यासागर ने वेथून-विद्यालय के सञ्चालन का काम छोड़ स्थापना के समय विद्यालय का नाम था हिन्दू-वालिका- विद्यालय । बेथून साहव बिल में विद्यालय के लिए बहुत सा रुपया लिख गये थे। उसी धन से विद्यालय का घर बना और उनके स्मारक के तौर पर उन्हीं के नाम पर विद्यालय का नामकरण हुआ। दिया। वेथून साहब के मरने पर विद्यालय के लिए विद्यासागर बड़ी मुश्किल में पड़े।

तव स्मरणीय गवर्नर-जनरल लार्ड कैनिंग की खी श्रीमती लेडी कैनिंग ने उक्त विद्यालय की पृष्ठपोषकता स्वीकार कर ली। इस विद्यालय को बनाये रखने के लिए उन्होंने अच्छी पार्थिक सहा- यता भी की। लेडी कैनिंग की चेष्टा से गवर्नमेंट ने भी उक्त विद्या- लय को धन से सहायता दी थी।

विद्यासागर ऐसे महानुभावों की बी-शिक्षा-प्रचार-सम्बन्धी चेष्टा आज सफल होती देख पड़ती है। दिन-दिन स्त्री-शिक्षा के फायदे लोगों की समझ में आते जाते हैं और इस और समाज की रुचि वढ़ती जाती है। अब लोग यह अच्छी तरह समझने लगे हैं कि जव तक हम स्त्रियों को पढ़ाने-लिखाने का प्रवन्ध नहीं करेंगे तव तक खना, लीलावती, सीता, सावित्री, गार्गी और आत्रेयी का नाम लेकर गौरव का अनुभव करना आत्मवञ्चना के सिवा और कुछ नहीं है। अतएव बालिकाओं को जैसे घर के कामकाज सिखलाये जाते हैं वैसे ही, जब तक वे सयानी न हों तब तक, उन्हें पढ़ाना-लिखाना भी चाहिए। किसी श्रुति या स्मृति में स्त्रियों को शिक्षा देने की मनाही नहीं लिखी है।

एक विदुपी वङ्गमहिला (श्रीमती मानकुमारी) के एक ग्रन्थ (कान्यकुसुमाञ्जलि ) की समालोचना करते हुए मान- नीय जज गुरुदास वनरजी लिखते हैं- “इन कविताओं को देखकर, साहस के साथ, यह बात कही जा सकती है कि स्त्री-शिक्षा का वड़ा अच्छा फल हुआ है।” पण्डित चन्द्रनाथ वसु ने इसी पुस्तक के सम्बन्ध में लिखा है-“एक विशुद्धमन, एक सरल-हृदय, एक सतोगुण की मूर्ति मुझे इन कविताओं में देख पड़ी।” कुछ लोग इस ज़माने में भी कुछ पढ़ी-लिखी स्त्रियों के बुरे आचरणों का उल्लेख करके स्त्री-शिक्षा का विरोध करते हैं। पर उन्हें यह विचारना चाहिए कि कच्चे नारियल का पानी बड़ा अच्छा होता है, पर वह काँसे के बर्तन में रखने से बराव हो जाता है।

तो इस पात्र-दोष को ज., के सिर मढ़ना कहाँ का न्याय है ? इस के अलावा बुरे आचरणवाले पढ़े-लिखे मर्दो का उल्लेख करके अगर कोई मर्दो की शिक्षा का द्वार वन्द करना चाहं तो फिर वे क्या कहेंगे? विद्यासागरजी जीवन की अन्तिम घड़ी तक स्त्री-शिक्षा के पूर्ण पक्षपाती रहे । स्त्री-शिक्षा की उन्नति के लिए जो लोग वैथून-विद्यालय को किसी प्रकार की सहायता करते थे उनसे मुलाकात होने पर विद्यासागरजी बराबर उक्त विद्यालय की खबर लेते थे ।

वेथून साहब के मरने के एक साल बाद उनके पुराने मित्र वोलपुर-निवासी प्रताप- नारायणसिंह ने अपने पुत्र हेमेन्द्रनाथसिंह के विलायत जाने की सम्भावना देखकर अपनी बहू सुशीला वाला को वेथून-कालेज में स्थायी भाव से भर्ती करने के लिए विद्यासागर को पत्र लिखा। विद्यासागरजी उक्त वालिका को कालेज में भर्ती कराने के लिए गये तो बालिकाओं और पढ़ानेवाली स्त्रियों को देखकर उनके आनन्द के आँसू बहने लगे।

आते समय विद्यासागर ने सबके जलपान के लिए मिठाई मँगा दी। पुराने समय की एक दासी उस समय भी विद्यालय में मौजूद थी, उसने आकर विद्यासागर को प्रणाम किया। उसके पुरानी बातें याद कराने पर विद्यासागर का हृदय भर आया और ऑखाँ से आँसू बहने लगे। स्कूल के दालान में येथून साहब की पत्थर की मूर्ति के आगे खड़े होकर विद्यासागरजी देर तक राते रहे। फिर उस पुरानी दासी को उन्होंने नये कपड़े मँगा दिये।

इस प्रकार सवको सन्तुष्ट करके वे अपने घर आये। ठीक उसी समय में विद्यासागरजी से मिलने गया था। अक्सर मुझे विद्यासागर के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। किन्तु उस दिन विद्यासागर के मुख पर जा घार विपाद की छाया देखी उस दंग्यकर मैं डर गया। मैंने बहुत व्यग्र होकर पृछा- “क्या तायत बहुत खराव है ?” कुछ उत्तर नहीं मिला। दम भर के बाद उन्होंन कुर्सी की ओर उँगली सं इशारा करकं मुझसे बैठने के लिए कहा। मैं धीरे से बैठ गया। घड़ी भर. वाद विद्या- सागर ने कहा-“नहीं, मेरी तबीयत नहीं ख़राब है।” मैंने पूछा- “ता फिर आप इतने उदास क्यों देख पड़ते हैं ?” उन्होंने कहा- “अभी मैं वचन-स्कूल गया था; वहां का हाल दंग्यकर बड़ा सुख हुआ।”

मैंने फिर भी विद्यासागर के गम्भीर हृदय की थाह न पा- कर, पहा-“उसमें फिर उदास हान का क्या कारण है ?” विद्या- सागर ने कहा- “इतनी लड़किया पढ़ती है और वहीं की पढ़ी हुई कुछ लड़किया वहा पढ़ाती भी है, किन्तु जिस पुरुप के उद्योग और उत्साह में यह सब हुपा उमन न देना ! अपनी पदमर्यादा का ख़यान्न न करकं जो उनकं माथ बलता और उन्हें अपनी पीठ पर चढ़ाता था वह महात्मा आज नहीं है!”

इस प्रकार बथून साहब के लिए शाकाकुल होकर विद्यासागरा बालकों की तरह रान न्तर्ग। विद्यासागर कंबल कलकत्ते के बथुन-विद्यालय की स्थापना और सञ्चालन के कार्य में सहायता करकं ही निशिन्त न घं। पहले कहा जा चुका है कि छोट लाट हालिई साहब की ज़वानी अाज्ञा से विद्या- सागर ने मंदिनीपुर, बर्दवान, हुगली और नदिया जिले के अनेक स्थानों में बहुत से यालिका-विद्यालय स्थापित किये थे और इसी काम को लेकर शिक्षाविभाग के तत्कालीन डाइरेकर यंग साहब के साथ उनकं स्थायी मनामालिन्य का सूत्रपात हुआ था। छोटे लाट ने इन विद्यालयों को स्थापित करने कालए विद्यासागर से अनुरोध किया था। किन्तु इस बारे में कोई लिखी हुई आज्ञा विद्यासागर को नहीं मिली थी।

यह मौका पाकर यंग साहव ने वालिका-विद्यालयों की स्थापना और उनके लिए धन खर्च करने का विरोध किया और इस चेष्टा में उनको सफलता भी प्राप्त हुई। ऊपर लिखे चारों जिलों के भिन्न-भिन्न स्थानों में पचास वालिका-विद्यालय खुल चुके थे। उनका खर्च अपने सिर लेना साधारण थात न थी। हर एक स्कूल में दो अध्यापक और एक नाकर था। उनकी तनख्वाह के अलावा और भी बहुत कुछ ख़र्च था।

लड़कियाँ बिना फीस के पढ़ती धों। उनको पढ़ने की पुस्तकें, काग़ज़, स्लेट, पेंसिल, सब देना पड़ता था। इसी समय विद्यासागर ने नौकरी भी छोड़ दी थी। वे इस समय बड़े ही धर्मसङ्कट में पड़ गये थे। वालिका-विद्यालय-सम्बन्धी बिल मंजूर न होने पर छोटे लाट ने विद्यासागर को अपने ऊपर नालिश करने की सलाह दी थी। किन्तु उसमें असम्मत होकर विद्यासागर ने कहा-“मैंने कभी किसी के ऊपर नालिश नहीं की।

फिर आप पर कैसे नालिश करूँ? इस रुपये को मैं फर्ज लेकर अदा कर दूंगा।” विद्यासागर को इस झञ्झट में केवल नौकरी ही नहीं छोड़नी पड़ी, प्रत्युत कर्जदार भी वनना पड़ा। इतने पर भी वे महात्मा वहुत दिनों तक इस चेष्टा में लगे रहे कि ये लड़कियों के स्कूल बन्द न होने पावें। इस काम में उनके कुछ अँगरेज़ दोस्त उनको मासिक सहायता दिया करते थे। उनमें सर सिसिल वीडन का नाम विशेषभाव से उल्लेख के योग्य है। सन् १८६३ की ३० वीं मई को सर सिसिल वीडन ने विद्या- सागर को जो पत्र लिखा था उसका कुछ अंश यहाँ उद्धृत किया जाता है। असल पत्र अँगरेज़ी में था।

Summary

हमें अलगता है की आपको शिक्षा कहानी शयद बहोत ही पसंद आयी होगी और ऐसे ही मजेदार किस्सों के लिए आप हमारे वेबसाइट पे आते रहिये जहा आपको ऐसी ही मजेदर इनफार्मेशन मिलती रहेंगी

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