“माँ का पत्र” Mom Hindi Essay

आज हम बात करने वाले है एक निबंध के बारेमे जो की माँ के पत्र से जुड़ा हुआ है. अगर अभी आप पढाई कर रहे है तो शायद आपको पता ही होगा की निबंध का महत्व भाषा जैसे विषय में कितना महत्व है. इसी लिए आज हम इस आर्टिकल में निबंध का एक उदहारण देख्नेगे जिससे आप अपना खुद का एक निबंद लिख सकते है.

“माँ का पत्र”

एक दिन मुकुन्द को अपनी माँ का खत मिला । यो देखा जाए, तो इस खत में कोई नई बात न थी। मुकुन्द अपनी मां को नियमिततापूर्वक पत्र लिखता और उसे प्रामाणिक रूप से अपने विचार और अनुभव बताता। माँ भी उसे ऐसी सलाह- शिक्षा और उत्साह-प्रेरणा देती, जो उचित होती, परन्तु इस बार उसे माँ के पत्र में कोई विशेष हेतु नज़र अाया, इस कारण वह इस पत्र का अमुक अंश बार-बार पढ़ रहा था- “मैं तेरे जन्म से ही तेरा निरीक्षण कर रही हूँ । कभी तेरी माँ, कभी तेरी दाई, कभी शिक्षिका और कभी परामर्शदात्री बनकर मैं तुझ से विविध संबंध रखती आई हूँ। लेकिन, अब वक्त आ पहुँचा है कि जब मुझे तेरी मित्र बनना है।

अब तू वयस्क हो गया है,इसलिए तेरे विचारों को विशिष्ठता मिलनी चाहिए। अवश्य तू अपने विचार और अनुभव को वृद्धि किए जा, परन्तु मुझे यह कहना है कि तू अपने विचार और अनुभव को विशेष दिशा दे। उन्हें विशेष स्वरूप दे, अन्यथा बनैले घास की तरह वे इच्छानुसार बढ़ते रहेंगे और उनमें कोई समरूपता या मर्यादा नहीं रह जाएगी। “तरुणावस्था में तरणों पर कोई खास। जवाबदारी नहीं रहती है और न उन्हें कोई चिन्ता ही होती है। फलस्वरूप बालकों को इस संसार का नाटक दर्शकों की भाँति श्राराम से, कुर्सी पर बैठे-बैठे, देखने को मिलता है।

और जिस प्रकार सुख-चैन तथा वैभव-विलास में पोषित राजा को दुष्कालीन संकटों के कारण जो कष्ट होता है उसकी कल्पना नहीं होती इसी प्रकार तरुण दर्शकों के विषय में भी यह बात समझ लेनी है। सारा संसार उन्हें गेंद की भौति दिखाई देता है और कुम्हार मिट्टी को जिस प्रकार इच्छित आकार देता है, उसी प्रकार इस संसार को इच्छित रूप और आकार प्रदान करूँ- ऐसी कामना तरुणों में रहती है।

लेकिन, मुझे इसकी कोई चिन्ता नहीं है। मुके जिस विषय का दुःख है, वह दो बातों को लेकर है। एक तो बुद्धि और शान के उदय-काल में जो प्रतिक्रिया होती है, उससे तरुण अपना कर्तव्य भी मूल जाता है। दूसरी बात यह है कि जिस समय वह अालोचना करता है, उस समय आलोच्य विषय में स्थित अपने भाग को भूल जाता है। “दुनिया चाहे जैसी हो, पर तुझे यह न भूल जाना चाहिए कि इसकी रचना में तेरा भी बहुत कुछ हिस्सा है।

पृथ्वी पर रहकर हम चन्द्रमा की अालोचना कर सकते हैं, परन्तु पानी में रहकर मगर से बैर करना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। जब तक हम संसार के उपकार ले रहे हैं, सेवा की अपेक्षा रख रहे हैं, उसकी कृपा से निभ रहे हैं, तब तक उसके जीवन के साथ हमारा जीवन सदा के लिए गुँथा हुअा है। इसका अर्थ यह नहीं कि दुनिया निर्दोष है, और यो मानकर, जो चल रहा है, उसे चलने देना चाहिए ।

मेरे कहने का यह तात्पर्य है कि उतावली में कोई मत बनाकर, दुनिया को दोष नहीं देना चाहिए; अथवा किसी भी विषय में देष-बुद्धि नहीं रखनी चाहिए, उसी प्रकार किसा का तिरस्कार न करना चाहिए । अभी भी जगत पूर्णावस्था को प्राप्त नहीं हुआ है । इसका यह अर्थ हुआ कि हम मनुष्य भी अपूर्णावस्था में हैं ।

व्यष्टि के कारण समष्टि की रचना होती है और यदि समष्टि का- समाज का सुधार करना है, तो व्यक्ति को अपने से शुरूवात करनी चाहिए “प्रत्येक व्यक्ति छोटे प्रमाण में अखिल जगत् है । यदि तुके सारे जगत् के समस्त स्वरूपों के कारण समझ लेने हैं, तो तू अपनी दृष्टि अपनी ओर केन्द्रित कर ।

सबसे पहले अपना सुधार कर । वर्तमान में तू छोटी-छोटी बातों से श्रारम्भ कर और पीछे यह देख कि जगत् की कठिनाइयाँ कैसी और कौन-सी हैं। यदि मनुष्य स्वयं का सुधार करने का प्रयत्न करता है, तो भी कहा जाएगा कि उसने बहुत-कुछ किया और उतने अंशों में वह संसार का कल्याण करेगा। “और इस प्रकार की दृष्टि तो तभी आएगी, जब मनुष्य अपने को संसार का एक अंश मानने लग जाएगा ।

जब मनुष्य संसार की टीका करता है, तो ऐसा मालूम होता है, मानो वह अपने आपको दुनिया से अलग मानकर टीका कर रहा है। जब वह जगत् से श्रास्मैक्य रखता है, तब उसकी टीका बन्द होती है, उस समय उसके हृदय में, प्रेम के सिवाय, दूसरी किसी भावना के लिए कोई स्थान नहीं रहता । प्रेम के समान दूसरा कोई-गुरु या शिक्षक नहीं । जब यह प्रीति, यह प्रेम स्वार्थ रहित हो जाएगा, तब यह समझ लेना होगा कि सुधा- रकों के हाथ में एक अचूक अस्त्र आ गया है।”

Summary

जैसे की आपको पता है की भाषा जैसे विषय में निबंध का बहोत ही महत्व है और इसी लिए इसको सीखना आपके लिए बहोत ही जरुरी है. आपको एस्से वाले सेक्शन में हिंदी निबंद के कही सारे उदहारण मिल जायेंगे।

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