“साहित्य” Historical Hindi Story Part 3

आज हम बात करने वाले है एक हिंदी ऐतिहासिक कहानी के बारे में जो की “साहित्य”जुडी है और मुझे विश्वाश है की शायद आपको यह जरूर पसंद आएंगी। यह कहानी बहोत साल पुराणी है शयद अभी आप जो कोई भी पढ़ रहे है उनके जन्म के पहले की जब भारत आज़ाद नहीं हुआ था.

यह कहानी बहोत ही लम्बी होने वाली है, क्यों की इससे जुड़े सभी पात्र और किस्सों को अगर हमने संक्षिप्त रूप दे दिया तो शायद आपको इसे पढ़ने में उतना मजा नहीं आएगा। इसी लिए हमें इसे ओरिजिनल रूप में ही रखा है और इसे हमने तीन हिस्सों में विभाजित किया है. इससे आप सभी पढ़ने में और आसानी होगी।

“साहित्य” अंश-3

इसी समय “तत्त्व- बोधिनी पत्रिका में विद्यासागर ने लिखना शुरू किया। तरह-तरह के प्रवन्ध लिखकर तत्त्वबोधिनी की शोभा और गौरव बढ़ाने के लिए विद्यासागर ने विशेष परिश्रम किया। जिस तत्त्ववोधिनी सभा की पत्रिका तत्त्ववोधिनी थी उसके मन्त्री भी विद्यासागर हो गये और साथ ही वे ब्राह्मसमाज की भी भलाई. सोचने लगे। इसी समय विद्यासागरने बॅगला-गद्य में महाभारत लिखना शुरू किया। चोधिनी पत्रिका में महाभारत की उपक्रमणिका क्रमशः प्रकाशित होने तत्त्व लगी। पीछे से सन् १८६० में वह उपक्रमणिका पुस्तकाकार छप- कर प्रकाशित हुई।

साहित्य Historical Hindi Story 3
साहित्य Historical Hindi Story

इस अन्य की भी लेखशैली मनोहर है। बड़े खेद की बात है कि गद्य-महाभारत पूरा नहीं हो सका। इसके बाद सन् १८६२ में विद्यासागर ने “सीतार वनवास नाम की पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में उन्होंने अपनी लेखशैली की शोभा और सौन्दर्य पूरी तौर से दिखला दिया है। यह पुस्तक सहृदयता और प्रसादगुण से परिपूर्ण है। यथार्थ में यह अनुवाद नहीं है। अनुवाद की छाया पड़ने पर भी इसे एक प्रकार से मालिक ग्रन्थ कह सकते हैं। इस अन्ध की विपयगत मौलिकता सम्पूर्णरूप से विद्या- सागर की न होने पर भी भाव और भापा के बारे में वही इस प्रकार के ग्रन्थ लिखने के पथदर्शक हैं। रामवनवास, रामवनगमन, राम- राज्याभिपंक आदि ग्रन्ध रामायण की छाया पर बँगला में लिखे गये इन ग्रन्थों का आदर्श “सीतार वनवास’ ही है। “सीतार वनवास” बहुत दिनों से स्कूलों में पढ़ाया जाता है।

दुःख-कष्ट में पड़कर भी एकनिष्ठता, सहिष्णुता और पति के प्रति अटल भक्ति दिखलाना ही इस पुस्तक की अमूल्य सम्पत्ति है। इस पुस्तक का प्रथम अंश तो भवभूति के उत्तरचरित का अविकल अनुवाद है, किन्तु आग का हिस्सा विलकुल नई रचना है। इसका एक पृष्ट भी ऐसा नहीं जिसे पढ़कर पत्थर भी पसीज न उठे। इसमें विद्यासागर ने करुणरस खूब दरसाया है। पं० रामगति न्यायरत्न ने इस पुस्तक की लिखावट पर प्रसन्न होकर गुप्तरूप से सोमप्रकाश-सम्पादक के द्वारा विद्यासागर को एक सोने की कलम उपहार में देने का विचार पर कई कारणों से वैसा नहीं हो सका।

“सीतार बनवास” लिखने के उपरान्त विद्यासागर ने “राम- राज्याभिषेक” लिखना शुरू किया था। कुछ दिनों बाद, जब इस किया था। अन्य के कई फार्म छप चुके थे तब, “सहचर” पत्र के सम्पादक शशिभूषण चटर्जी ने निज रचित “रामराज्याभिषेक की एक कापी लाकर विद्यासागर को अर्पण की। विद्यासागरजी ने देखा कि शशिभूपण वावू की पुस्तक अच्छी हुई है। तब उन्होंने अपना “रामराज्याभिषेक छापना बन्द कर दिया।

साहित्य-संसार में आजकल ऐसी उदारता कम देखने को मिलेगी। इसके बाद विद्यासागर ने सन् १८६४ में “पाख्यानमञ्जरी” सन् १८६८ में “व्याकरणकौमुदी’ का दूसरा हिस्सा, सन् १८७० में सटीक मेघदूत और बीमारी की हालत में वर्दवान में रहते समय- शेक्सपियर के “Comedy of Errors” के आधार पर “भ्रान्ति- विलास” लिखा। भ्रान्तिविलास ग्रन्थ बहुत ही अनूठा है। इसमें निर्मल हास्य है। इसके उपरान्त विधवा-विवाह और कुलीनों के बहु-विवाह के सम्बन्ध में कई पुस्तकें विद्यासागर ने लिखीं।। विद्यासागर ने सव मिलाकर ५२ ग्रन्थ लिखे।

उनमें १७ संस्कृत के अन्ध हैं। उपक्रमणिका और उसके उपरान्त के व्याकरण खास उनके परिश्रम का फल हैं। ऋजुपाठ आदि कई पुस्तकें संस्कृत के अनेक अन्धों से संग्रह करके लिखी गई हैं। उन्होंने रघु- वंश, किरातार्जुनीय, माध, मेघदूत आदि ग्रन्थों के पाठान्तर मिलाकर मूल ग्रन्थ भी प्रकाशित किये हैं। पाँच अँगरेज़ी के ग्रन्थ हैं। उनमें से विधवा-विवाह-सम्बन्धी अँगरेज़ी की पुस्तक उनकी निज की रचना है और अन्य पुस्तकें संग्रह या अनुवाद-मात्र हैं।

शेप ३० पुस्तकें बँगला की हैं। उनमें १४ स्कूली किताबें हैं। इन १४ में वर्ण- परिचय आदि उनकी निज की रचना हैं। और स्तके अँगरेज़ी या संस्कृत की पुस्तकों के अनुवाद हैं। बची हुई १६ पुस्तकों में तीन पुस्तकें भारतचन्द्ररचित अन्नदामङ्गल, विद्यासुन्दर और मानसिंह के सुसम्पादित संस्करण हैं। १३ पुस्तकें सर्व-साधारण के लिए लिखी गई हैं। शकुन्तला, सीतार वनवास और भ्रान्तिविलास आदि कई पुस्तकें अन्य भाषाओं के अनुवाद या उनके आधार पर लिखी हुई हैं। बाकी ग्रन्थ उनकी निज की रचना है। विधवा- विवाह और बहुविवाह के सम्बन्ध में लिखी गई सव पुस्तकें मौलिक हैं।

उनके लिए विद्यासागर किसी के भणी नहीं। विद्यासागर के पहले बँगला-साहित्य ‘साहित्य’ नाम के योग्य ही न था। उनके पहले साहित्य की कैसी बुरी हालत थी और उनको चेतालपचीसी ने साहित्य-संसार में कैसा युगान्तर उपस्थित कर दिया, इसके सम्बन्ध में पण्डित रामगति न्यायरबजी लिखते हैं-“इस समय जो सुन्दर सुश्राव्य संस्कृत-शब्दमयी बंगला-भापा लिखने को शुद्ध रीति प्रचलित हुई है इसका मूल कारण विद्यासागर की बेवालपचीसी ही है। वेतालपीसी के पहले वैसी भापा नहीं लिखी जाती थी। उसके जन्मदाता विद्यासागर ही हैं।

वास्तव में विद्यासागर ने बड़े परिश्रम से सोच-विचारकर सहज में समझने लायक बंगला लिखना प्रारम्भ किया था। उनकी लेखशैली की विशेषता यह है कि एक और सीतार वनवास, शकुन्तला, भ्रान्ति- विलास आदि पुस्तकों में उन्होंने मधुर और कोमल भापा लिखी है और दूसरी ओर विधवा-विवाह आदि शास्त्रीय समालोचना-ग्रन्थों में ओजस्विनी भापा का प्रयोग किया है। विद्यासागर के वर्ण-परिचय, कथामाला आदि शिशुपाठ्य अन्धों में बहुत ही सरल भाषा लिखी गई है। उसी लेखनी ने वेतालपचीसी में सुललित भापा और जीवन- चरित में गम्भीर भापा लिखकर अपनी विचित्र शक्ति का परिचय दिया है।

इसी भापा की सरलता, कोमलता, गम्भीरता और ओज- खिता में ही विद्यासागर की विचित्र प्रतिभा का परिचय प्राप्त होता है। विद्यासागर ने बँगला की पहली पुस्तक “वर्ण-परिचय पालकी पर चलते-चलते एक दिन में लिखी थी। बॅगला-भापा में विराम- चिह्न (,), विस्मय-चिह्न (!) और प्रश्न-चिह्न (?) का प्रयोग भी सबसे पहले विद्यासागर ही ने किया था। ये चिह्न अर्थ समझने में बड़ी सहायता करते हैं, और इस कारण भी बगला-भाषा का साहित्य विद्यासागर के निकट विशेप रूप से ऋणी है। साहित्य-चर्चा में लोगों की रुचि पैदा करने और लोक-शिक्षा का मार्ग सुगम और सहज-साध्य बनाने के जितने उपाय हैं उनमें समाचारपत्रों का प्रचार एक प्रधान उपाय है। इसके द्वारा बहुत ही थोड़े दिनों में इस देश की जातीय उन्नति में युगान्तर उपस्थित हो गया है।

समाचारपत्रों में उपन्यास, आख्यायिका, समाजतत्त्व, इतिहास और विज्ञान के अनेक लेख प्रकाशित होने के कारण उनके पाठक लोग हमेशा अगली संख्या देखने के लिए उत्सुक बने रहते हैं। जिस समाचारपत्र को पढ़ने के लिए लोगों को जितना अधिक आग्रह होता है उसमें जन-समाज पर असर डालने की ताकत भी उतनी ही अधिक होती है। इंग्लेण्ड में टाइम्स, डेलीन्यूज़ आदि समाचार- पत्रों का ही सचा आधिपत्य है।

बङ्गाल में भी समाज-तत्त्व, ज्ञान और विज्ञान के तत्वों का प्रचार करके उच्च श्रेणी के पत्रों ने कैसा दवदवा जमा लिया था इसके उज्ज्वल दृष्टान्त तत्त्ववोधिनी, प्रभाकर, बङ्गदर्शन, वान्धव, वामावोधिनी और भारत-संस्कारक आदि पुराने और नये पन्न हैं। वर्तमान समय में जो साप्ताहिक समाचारपत्र इस प्रकार शक्ति प्राप्त करके वङ्ग देश की सेवा कर रहे हैं उनमें सबसे पहला पत्र “समाचारदर्पण’ था। इसे श्रीरामपुर के मिशनरी मार्शमैन साहव ने सन १८१८ के अगस्त महीने में निकाला था। यह पत्र सन् १८४१ तक निकलता रहा। उस समय २३ वर्ष तक उस समय निकलकर समाचार-दर्पण देश की सेवा करता रहा, यही उसके लिए यथेष्ट गौरव की बात है।

बंगला का पहला समाचारपत्र होने के कारण तत्कालीन गवर्नर-जनरल हेस्टिंग्स और उनके बाद लार्ड अमहर्ट इस पत्र को सरकारी सहायता देते रहे थे। सन् १८१८ में महात्मा राममोहन राय द्वारा सम्पादित “कौमुदी,” उसके बाद सन् १८२२ में “समाचारचन्द्रिका निकली। समा- चार-चन्द्रिका को सतीदाह का समर्थन करने के लिए, राममाहन राय के खिलाफ, स्वर्गीय भवानीचरण बनर्जी ने निकाला था। इसके बाद सन् १८३० में माघ के महीने से विद्यासागर ने “संवादप्रभाकर’ निकालना शुरू किया। प्रभाकर की प्रभा के आग पहल के समाचारपत्र कुछ फीकं पड़ गये थे ।

गद्य की जैसी दुर्दशा थी वैसे ही समाचारपत्रों के लेख भी होते य। उस भापा से पाठकों की तृप्ति नहीं होती थी। हाँ, पद्य जो प्रकाशित होते थे वे उत्तम और मनोहर हुआ करते थे। यह सच है कि विद्यासागर के पहले भी अनेक पत्र बँगला में निकलते थे, परन्तु ऊँचे दर्जे का सर्वजनप्रिय पत्र भी पहले पहल विद्यासागर ने ही निकाला था। उस पत्र का नाम ‘सोमप्रकाश था। संस्कृत- कालेज की परीक्षा पास किये हुए एक वहरं विद्यार्थी का नाम शारदा- चरण था। उसकी लेखशैली प्रशंसनीय थी। विद्यासागर ने उसी छात्र का सामप्रकाश के सम्पादन का काम सौंप दिया। किन्तु सोमप्रकाश की उन्नति के लिए विद्यासागर स्वयं यथेष्ट परिश्रम करते थे।

विद्यासागर के संसर्ग, उत्साह और सहायता से फुर्ती के साथ सोमप्रकाश की श्रीवृद्धि होने लगी। बर्दवान के राजभवन में महाभारत के बँगला अनुवाद का काम पाकर शारदाचरण वहां चले गये तब सोमप्रकाश का सम्पादन स्वनामधन्य स्वर्गीय द्वारकानाथ विद्याभूपण को सौंपा गया। इन्होंने सोमप्रकाश की और भी उन्नति की। विद्यासागर सदा सोमप्रकाश के पृष्ठपापक बने रहे। पहले-पहल विद्यासागर के लेख भी उसमें निकले थे।

जैसे वर्तमान बंगला- गद्य-प्रन्यों की भापा का आदर्श बेतालपर्चासी है वैसे ही ऊँचे दर्जे के, सुरुचिसङ्गत और प्राचल भाषा में लिखे गये, बँगला-अखवारों का पथप्रदर्शक सोमप्रकाश है। सोमप्रकाश, प्रचार और तत्व- बोधिनी के अतिरिक्त और भी किसी-किसी पत्र में, समय-समय पर, विद्यासागर ने लेख लिखे हैं। वे जव जिस पत्र में लिखते थे तब उसे लोग बड़े ओदर और चाव से पढ़ते थे।

विद्यासागर की लेखशैली की उनके सम-सामयिक और परवर्ती सव विद्वानों ने मुक्त- कण्ठ होकर प्रशंसा की है। विज्ञवर राजनारायण बाबू ने अपनी बँगला-भापा और साहित्य शीर्पक वक्तृता में कहा है-“अब हम बँगला-भापा के जानसन विज्ञबर माननीय श्रीयुत ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की ओर अग्रसर होते हैं। विद्यासागरजी ने ही अपने लिखे और प्रकाशित ग्रन्थों के द्वारा बैंगला की वर्तमान उन्नति का प्रथम सूत्रपात किया है।

साहित्य Historical Hindi Story 2
साहित्य Historical Hindi Story

अनेक लोगों को मालूम नहीं है कि देवेन्द्रनाथ ठाकुर और विद्यासागर ने बँगला के उद्भट लेखक अक्षयकुमार दत्त का कितना उपकार किया है। अक्षय वावू के लेख को पहले पहल ये ही दोनों महाशय देख- कर शुद्ध कर दिया करते थे। कुछ दिनों में अक्षय बाबू स्वयं प्रवीण लेखक हो गये और उनके लेख में संशोधन की आवश्यकता ही न रही। बहुत लोगों की धारणा है कि विद्यासागर में उद्भावनी शक्ति न थी, उन्होंने जो कुछ लिखा है वह अनुवादमात्र है। किन्तु जिन्होंने विद्यासागर के ‘संस्कृतसाहित्य-विषयक प्रस्ताव’ और ‘विधवा-विवाह विचार’ को पढ़ा है वे कभी यह नहीं कह सकते कि विद्यासागर में अपने दिमाग से कुछ लिखने की ताकत न थी।

बँगला में व्याख्यान देते समय और उसे समाप्त करते समय अनेक अँगरेज़ीदाँ लोग अज्ञातभाव से विद्यासागर-लिखित विधवाविवाह- सम्बन्धी दूसरी पुस्तक के उपसंहार का अनुकरण किया करते हैं। विद्यासागर-लिखित सीवार वनवास में भवभूति के उत्तरचरित और वाल्मीकि की रामायण का कोई-कोई अंश अवश्य लिया गया है। किन्तु उसमें विद्यासागर के अपने दिमाग से लिखे गये अनेक मनोहर अंश भी हैं। सीतार वनवास को एक प्रकार से मालिक ग्रन्थ कहना ही ठीक होगा। विद्यासागरने बँगला के सङ्गठन और परिमार्जन का बहुत कुछ काम किया है।

बगला-भापा उनके निकट बहुत कुछ ऋणी है।” स्वर्गीय प्यारीचाँद मित्र की प्रन्यावली की भूमिका में रायबहादुर वङ्किमचन्द्र चट्टोपाध्याय सी. पाई.ई. महोदय लिखते हैं-“कहा जाता है कि राजा राममोहन राय उस समय के प्रथम गद्य-लेखक हैं। उनके बाद जो गद्य लिखा जाने लगा वह प्रचलित बँगला से विलकुल भिन्न था। यहाँ तक कि बँगला-मापा दो तरह की कह- लाई जाने लगी। एक साधुभापा अर्थात् पण्डितों की भापा, और दूसरी इतर-मापा अर्थात् पण्डितेवर लोगों के व्यवहार में आनेवाली भापा।

मैंने खुद बचपन में अध्यापक पण्डितों को जिस भाषा में बावचीत करते देखा है उस भाषा को संस्कृत पढ़े-लिखे लोगों को छोड़कर और कोई समझ नहीं सकता था। वह बँगला सोलहों आने संस्कृत होती थी। वे ‘खैर’ न कहकर ‘खदिर’ कहते थे। ‘चीनी’ से उन्हें अरुचि थी; उन्हें ‘शर्करा’ ही भाती थी। वे चूल (पाल), केला, दई (दही) की जगह केश, रम्भा, दधि ही कहते थे। मैंने खुद एक दिन देखा है कि एक अध्यापक पण्डित ‘शिशुमार’ कहकर ‘शशुक’ (सूस) का बयान कर रहे थे। सुननेवालों में कोई ‘शिशुमार’ का अर्थ न जानता था।

अगर पण्डितजी ‘शुशुक’ कहते तो सबकी समझ में आ जाता । पण्डितों की बोलचाल की भापा जव ऐसी थी तव उनकी लिखी वॅगला-भापा कैसी होगी, इसका अनुमान पाठकगण स्वयं ही कर सकते हैं। ऐसी भाषा में कोई अन्ध लिखा जाता तो वह उसी समय लुप्त हो जाता; क्योंकि उसे पढ़नेवाला कोई न मिलता। इसी से उस भाषा में लिखे अन्यों-द्वारा बँगला- साहित्य की श्रीवृद्धि नहीं हो सकती थी। इस संस्कृतमयी भापा को पहले पहल महात्मा ईश्वरचन्द्र विद्यासागर और बाबू अक्षयकुमार दत्त ने सहजवाध्य सुश्राव्य शब्दों से अलङ्कृत और परिमार्जित बनाया।

इनकी भाषा संस्कृत की अनुगामिनी होने पर भी इतनी कठिन नहीं है। खासकर विद्यासागर की भापा अत्यन्त मधुर और मनोहर है। उनके पहले कोई ऐसी मधुर गद्य-बँगला न लिख सका है और न आगे कोई लिख सकेगा।” श्रद्धास्पद पङ्किम बाबू ने ठीक ऐसी ही वाते मुझसे भी कही घीं। उन्होंने कहा था -“विद्यासागर के हाथों सङ्गठित और सुसंस्कृत भापा ही हम लोगों का मूलधन है। उन्हीं की सम्पत्ति लेकर इस समय हम बँगला-साहित्य की श्रीवृद्धि का प्रयास कर रहे हैं।”

वड़ी ही कृतज्ञता और विनय के भाव से बङ्किम बाबू ने यह बात कही थी। बहुत से अन्धों के लेखक बाबू रजनीकान्त गुप्त ने अपने ‘स्वर्गीय ईश्वरचन्द्र विद्यासागर’ लेख में लिखा है-“विद्यासागर और किसी काम में हाथ न डालवे तो भी वे अपनी अमृतमयी लेखनी से निकली ग्रन्थावली के कारण वङ्गसाहित्य में चिरकाल तक अमर बने रहते । वे बँगला-साहित्य के पिता न होने पर भी स्नेहमयी माता की तरह उसके पोपक और सँवारने-सिंगारनेवाले अवश्य हैं।

उन्हीं के प्रयत्न से गद्य-साहित्य की उन्नति और पुष्टि हुई है। दशभुजा दुर्गा की प्रतिमा के बाँस-फूस-रस्सी के ढाँचे पर मिट्टी लेसी गई थी। विद्यासागर ने उस मिट्टी को चिकना कर, उस मूर्ति पर रङ्ग फेरकर, उसे सुसज्जित, श्रीसम्पन्न और मनोहर बना दिया। उनके असम्पूर्ण महाभारत और बेतालपचीसी की भाषा में जैसे ओजस्विता और शब्दप्रयोगवैचित्र्य देख पड़ता है वैसे ही उनके सीतार वनवास और शकुन्तला में ललित पदविन्यास के साथ-साथ असामान्य माधुर्यगुण का उत्कर्प दृष्टि- गोचर होता है।

उनमें गद्यरचना की असाधारण शक्ति थी, इसका वढ़िया उदाहरण उनका सीतार वनवास श्री शकुन्तला है।” बहुत सी ऐसी पुस्तकें भी विद्यासागर की है जिन्हें प्रारम्भ करके समय न मिलने के कारण वे लिख नहीं सके। ऐसी पुस्तकें या तो असम्पूर्ण ही पड़ी रह गई हैं और या विद्यासागर की अनु- मति से उनके किसी इष्टमित्र ने उन्हें पूर्ण कर डाला है। जैसे ‘नीति- वोध’ नाम की पुस्तक विद्यासागर ने शुरू की थी, पर समयाभाव से वे उसे पूर्ण नहीं कर सके। उस पुस्तक को, उनके कहने से, उनके प्रिय मित्र राजकृष्ण बाबू ने पूरा किया। विद्यासागर की बहुत दिनों से भारत का एक सर्वाङ्गपूर्ण इतिहास लिखने की इच्छा थी। उसका सच सामान भी उन्होंने जुटा लिया था।

अस्सी वर्ष की अवस्था में, जब वे बीमार पड़े हुए थे तब उन्होंने अपने स्नेहपात्र नीलाम्बर मुखोपाध्याय एम० ए० से कहा-“मैं एक भारत का सर्वाङ्गपूर्ण इतिहास लिखना चाहता था, उसका सामान भी जुटा रक्खा है, पर अब मुझसे यह काम होने की कोई सम्भावना नहीं। तुम लिखे-पढ़े योग्य आदमी हो। तुमसे यह काम अच्छा हो सकता है। इस समय वहाँ मैं भी उपस्थित था। अन्त समय, विद्यासागरजी गुणग्राही पुरुप घे | गुण का आदर करने में वे कभी चूकते न थे। मोतीलाल शील और द्वारकानाथ ठाकुर की वे सदा प्रशंसा किया करते थे। इन दोनों सज्जनों के जीवनचरित लिखने की भी उनकी बड़ी इच्छा थी। किन्तु दुःख की पात है कि उनकी यह इच्छा भी पूरी न हो सकी।

साहित्य Historical Hindi Story 1
साहित्य Historical Hindi Story

विद्यासागर ने विद्यालय में ‘विद्यासागर’ की उपाधि पाकर ही विद्याचर्चा की इतिश्री नहीं कर दी। चे जन्म भर विद्या का अनु- शीलन करते रहे । अन्त समय, बीमारी की हालत में भी, वे वरावर पुस्तकें पढ़ते रहते थे। हाथ-पैर समेटकर चंकार बैठे रहने का उनको अभ्यास न घा। वे हमेशा कुछ न कुछ करते ही रहते थे। उन्होंने अपना एक पुस्तकालय वना रक्खा था। उममें संस्कृत, ढंगला, हिन्दी और अँगरजी की अनेक पुस्तकें थी।

अपनी चेष्टा से विद्यासागर ने जो संस्कृत की पुस्तकें पाई थी उनके अलावा अनेक हस्तलिखित संस्कृत-पुस्तकें भी उन्होंने अपने यहाँ जमा कर रक्खी थी। संस्कृत-पुस्तकें उनके यहाँ असंख्य घी और वे खूब ही सुरक्षित थीं। वे अँगरेज़ी की पुस्तकों का भी यथेष्ट आदर करते थे। सुपरिचित और गण्य मान्य अँगरेज़ों को लिखी सभी पुस्तकें उनके पुस्तकालय में थी। चाहे संस्कृत का हो, चाहे अँग- रेज़ी का, कोई नया अन्य प्रकाशित होते ही वे उसे मॅगा लेते थे।

कोई-कोई कहते हैं कि उनके पुस्तकालय में पुस्तकों का जैसा संग्रह था, वैसे वे विद्वान् न घे। यदि ऐसा था तो वे यह कैसे यथासमय वतला देते थे कि इस प्रन्य में इस विषय की आलोचना है, इसकी भाषा ऐसी है, इससे इस-इस तत्त्व का संग्रह किया जा सकता है- इत्यादि । .मैंने खुद देखा है कि चाहे जिस विषय की चर्चा हो, वे उसके सम्बन्ध में किसी प्रवीण लेखक की राय का उल्लेख करके अपना मन्तव्य प्रकट करते थे।

मैंने उन्हें स्काट, शेक्सपियर मिल्टन, हक्सले, टिण्डेल, मिल, स्पेन्सर आदि अँगरेज़ कवि, औपन्यासिक, वैज्ञानिक और दार्शनिक पण्डितों के ग्रन्थों के बारे में आलोचना करते देखा है। उन्होंने पुस्तकालय की शोभा बढ़ाने के लिए कोई पुस्तक नहीं खरीदी। उन्होंने जो पुस्तक ख़रीदी उसे पढ़ा और फिर अच्छी जिल्द बँधाकर पुस्तकालय में रख दिया। वे अच्छे दाम देकर सोने के अक्षरों से विभूपित अच्छी जिल्द बैंधवाते थे एक बार एक प्रतिष्ठित पुरुष विद्यासागर से मिलने और उनका पुस्तकालय देखने आये। पुस्तकें देखकर उन्होंने कहा-“इस तरह बहुत दाम खर्च करके जिल्द बँधवाना क्या आप अच्छा समझते है ? विद्यासागर ने कहा-“क्यों, इसमें क्या कुछ दोप है ?” इसके उत्तर में आनेवाले महाशय ने कहा-“इस रुपये से अनेक आदमियों का एपकार हो सकता था ।”

उस समय इस बात को विद्यासागरजी टाल गये, कुछ नहीं कहा। थोड़ी देर में इधर-उधर की बातचीत करते-करते विद्यासागर ने उनसे पूछा-“महाशय, यह शाल का जोड़ा आपने कितने को लिया था ? चीज़ तो अच्छी है।” उक्त महाशय ने कहा-“यह जोड़ा ५०० रुपये को खरीदा था। विद्यासागर ने कहा-“पाँच रुपये के कम्बल से भी तो जाड़ा जा सकता है, फिर इतना कोमती दुशाला ओढ़ने की ज़रूरत क्या है ? इस रुपये से भी तो बहुत लोगों का उपकार हो सकता था। मैं तो जाड़ों में मोटी चद्दर का जोड़ा ग्राढ़ा करता हूँ” बाबू साहव बहुत ही शरमाये।

उन्होंने कहा -“मुझसे बड़ी वेअदबी हुई, माफ़ कीजिएगा। उक्त उत्तर से वाबू साहव ऐसे झेपे कि जब तक वहाँ रहे, आँख सामने करके बात नहीं कर सके । पहले विद्यासागरजी अपनी लाइबेरी से इष्टमित्रों को पुस्तकें, देखने के लिए, ले जाने देते थे। एक बार उनके एक मित्र एक बहुमूल्य पुस्तक विद्यासागर से मांग ले गये । कुछ दिनों बाद विद्या- सागर ने जब वह पुस्तक मँगा भेजी तव उन भलेमानुस ने कहला भेजा-“वह पुस्तक मैंने लौटा दी है।” विद्यासागर को इससे बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने प्रतिज्ञा कर ली कि अब किसी को पुस्तक ले जाने न देंगे।

जो पुस्तक इस प्रकार खो गई थी वह एक दुष्प्राप्य संस्कृत-अन्ध था। जर्मनी के सिवा और कहीं मिल न सकता था। और वहाँ भी नया संस्करण हुए बिना उसके मिलने की कोई सम्भावना न थी। किन्तु सुनकर पाठकों को आश्चर्य होगा कि विद्यासागर का जाना-पहचाना एक पुस्तक-विक्रेता (Taurker) उसी पुस्तक को विद्यासागर के पास बेचने लाया। थोड़ी देर तक तो विस्मित विद्यासागर चुपचाप खड़े रहे, उसके बाद उन्होंने उससे पूछा-“तूने यह पुस्तक कहाँ से पाई ?” इसके उत्तर में उसने उन्हीं महाशय का नाम लिया जो विद्यासागर से मांग ले गये थे।

सुनकर क्रोध के मारे विद्यासागर कापने लगे। इसके बाद जो दाम उस फेरीवाले ने माँगे वही देकर उन्होंने वह पुस्तक खरीद ली। इसके बाद एक टुकड़ा काग़ज़ भी विद्यासागर किसी को ले जाने न देते थे। विद्यासागर की साहित्य-सम्बन्धी दो-एक बातें आगे चलकर, प्रसङ्गवश, लिखी जायेंगी।

Part 1, Part 2 and Part 3 Link

End

जैसे की आपको पता है यह कहानी छोटी नहीं है तो हमने इसे तीन हिस्सों (अंश) में विभाजित किया हुआ है तो यह इस पूरी कहानी का तीसरा विभाग था. आपको इसके बाकि दोनों विभाग भी हमारी Website में मिल जायेंगे.

Summary

यह इस कहानी का आखरी और अंतिम भाग था, यहाँ पर यह कहानी समाप्त होती है और आशा करता हु किइसको पढ़ने में आपको मजा आया होगा। ऐसे ही मजेदार जानकरी के लिए आप हमारे इस ब्लॉग को विजिट कर सकते है जहा हम वडा करते है की आप तक नयी नयी जानकरी रेगुलर बेसिस पर पहोचते रहेंगे। धन्यवाद्।

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