“साहित्य” Historical Hindi Story Part 2

आज हम बात करने वाले है एक हिंदी ऐतिहासिक कहानी के बारे में जो की “साहित्य”जुडी है और मुझे विश्वाश है की शायद आपको यह जरूर पसंद आएंगी। यह कहानी बहोत साल पुराणी है शयद अभी आप जो कोई भी पढ़ रहे है उनके जन्म के पहले की जब भारत आज़ाद नहीं हुआ था.

यह कहानी बहोत ही लम्बी होने वाली है, क्यों की इससे जुड़े सभी पात्र और किस्सों को अगर हमने संक्षिप्त रूप दे दिया तो शायद आपको इसे पढ़ने में उतना मजा नहीं आएगा। इसी लिए हमें इसे ओरिजिनल रूप में ही रखा है और इसे हमने तीन हिस्सों में विभाजित किया है. इससे आप सभी पढ़ने में और आसानी होगी।

“साहित्य” अंश-2

यह बात किसी कदर सच भी जान पड़ती है। क्योंकि वन्द्योपाध्यायजी और उनके वंशधर लोग स्मृतिशास्त्र की व्यवस्था देना सहजसाध्य धनाने के लिए वहुत-से स्मृति-अन्य बँगला-गद्य में लिख गये हैं। भट्टाचार्य घराने का कोई भी आदमी संस्कृत न जानने पर भी व्यवस्था दे सके, इसी अभिप्राय से बॅगला-स्मृतिकल्पद्रुम लिखा गया था। चाचाजी ने जिस समय की बात कही उस समय घानाकुल के भट्टाचार्यों में से कई आदमी मेरे घर में पढ़ते थे। यह कुछ विचित्र नहीं है कि उन लोगों में से किसी की ज़बानी खवर पाकर एक संस्कृत न जाननेवाले आदमी (अर्थात् चाचाजी के फूफा) ने उक्त अन्य की कापी करके पाण्डित्य-प्रसिद्धि पाने की चेष्टा की हो।

इसी समय पूर्वोक्त गौरीशङ्कर भी मेरे घर में पढ़ते थे। उन्होंने इस ग्रन्थ की गद्य-प्रणाली देखकर वैसा ही गद्य लिखने की चेष्टा की हो तो क्या आश्चर्य है। और भी एक बँगला-गद्य में लिखित स्मृति-प्रन्य शेरपुर-निवासी पण्डित-प्रवर महामहोपाध्याय श्रीयुत चन्द्र- कान्त तर्कालङ्कारजी के घर में मिला है। वह भी निपट आधुनिक नहीं जान पड़ता। सचर वरस के लगभग हुए, जब मेरे घर में स्मृति-कल्पद्रुम अन्ध की नकल की गई थी।

साहित्य Historical Hindi Story 3
साहित्य Historical Hindi Story

उस समय जिस पुस्तक से नकल की गई थी वह पुरानी थी। अनायास यह अनुमान किया जा सकता है कि वह १०० वर्ष पहले की लिखी हुई थी। बल्कि वह प्रति इससे भी अधिक पुरानी मानी जा सकती है । नारायण ठाकुर और उनके पुत्रों ने इस ग्रन्थ को धैंगला-गद्य में लिखा था। वे नकल करने के समय से २०० वर्ष पहले पैदा हुए थे। राममोहन राय की बँगला-पन्थावली इस शताब्दी के १४/१५ वर्ष बीतने पर लिखी जाने लगी थी।

अतएव बँगन्ना-स्मृतिकल्पद्रुम उसकी अपंक्षा प्राचीन है। एकान्त वर्शवद श्रीहरप्रसाद शाली। किन्तु महात्मा राममोहन राय के जीवनचरित में उन्होंने लिखा है-“सालह वर्ष की अवस्था में मैंने हिन्दुओं की मूर्ति-पूजा के विरुद्ध एक पुस्तक लिखी थी।” यह पुस्तक निस्सन्देह गद्य ही में लिखी गई थी। राममोहन राय की गद्यरचना का समय सन् 1814 नहीं, सन् 1967 ही है। अब इससे यह स्पष्ट प्रमाणित होता है कि उस समय के बहुत पहल से बङ्गाल के अनेक स्थानों में, छिपे हुए रनों की तरह, बहुत हस्तलिखित गद्य-अन्य यत्नपूर्वक सुरक्षित रहने पर भी उनके द्वारा महात्मा राममोहन राय का कुछ उपकार नहीं हुआ।

सात- आठ वर्ष तक पटने में और उसके बाद काशी में पढ़ने के लिए रह- कर सोलह वर्ष की अवस्था में घर आकर उन्होंने पहली पुस्तक लिखी थी। उनके उक्त प्रन्ध लिखने के समय उन्हें यह बात बिलकुल नहीं मालूम थी कि और कहीं भी गद्य-अन्य मौजूद हैं। कहने का खास मतलब यह है कि उन्होंने शास्त्र-प्रचार के लिए जितने गद्य-प्रन्थ लिखे थे उनकी भापा उन्हीं की प्रतिमा का निज-ख थी। राममोहन राय भाषाप्रणाली के विषय में किसी के ऋणी थोड़े- इस बात को नहीं हैं। वेदान्त-अन्ध की भूमिका में उन्होंने बँगला-गद्य पड़ने के नियमों के बारे में जो उपदेश दिया है उससे स्पष्ट प्रमाणित हावा है कि इस तरह गद्य पढ़ने का लोगों को अभ्यास न था ।

हम उस भूमिका का कुछ अंश यहाँ उद्धृत किये देते हैं।- “ओं वत्सत् । पहले तो बगला-भाषा में केवल आवश्यक घर के कामों के निर्वाह-योग्य कुछ शब्द हैं। यह भापा संस्कृत की कितनी अनुगामिनी है, यह बात उस समय स्पष्ट जान पड़ती है जब किसी दूसरी भाषा का अनुवाद इस भापा में किया जाता है। दूसरे, इस भाषा में अभी तक किसी शाल या काव्य का वर्णन नहीं किया गया। इसका फल यह देख पड़ता है कि इस देश के अधिकांश लोग अभ्यास न होने के कारण, दो-तीन वाक्यों का अन्वय करके उसका अर्थ समझने में असमर्थ-से देख पड़ते हैं।

कानूनी तर्जुमा का अर्थ समझने के समय यह बात स्पष्ट जान पड़ती है। अतएव वेदान्त-शान की भापा लिखना साधारण वातचीत की भापा की तरह सुगम न देखकर इसे पढ़ने में किसी-किसी का मन नहीं लगेगा। इसी लिए यह भूमिका लिख रहा हूँ। जिन लोगों को संस्कृत में कुछ भी व्युत्पत्ति होगी और जो लोग ऐसे व्युत्पन्न लोगों के साथ रहकर साधुभापा बोलते और सुनते हैं वे थोड़े ही परिश्रम से इस गद्य-व्याख्या का अर्थ समझ लेंगे। वाक्य के प्रारम्भ और समाप्ति का ख़याल खास तौर पर रखना चाहिए। जिस-जिस जगह जब, जो, जैसे इत्यादि शब्द हो उस-उस जगह उनके प्रतिशब्द तब, वह, वैसे इत्यादि शब्दों का अन्वय करके वाक्य को समाप्त करना चाहिए।

जब तक वाक्य की क्रिया न मिले तव तक वाक्य को समाप्त समझ- कर उसका अर्थ निकालने की चेष्टा न करनी चाहिए। किस नाम के साथ किस क्रिया का अन्वय है, इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि कभी-कभी एक वाक्य में कई नाम और कई क्रियाएँ रहती हैं। उनमें से किस नाम के साथ किस क्रिया का अन्वय है, यह जाने विना ठीक अर्थ समझ में नहीं आ सकता। इसका उदाहरण नीचे दिया जाता है।

जैसे-ब्रह्म, जिसे सब वेदों में गाते हैं और जिसकी सत्ता के सहारे जगत् का काम चलता है, नवकं उपास्य हैं। इस उदाहरण में यद्यपि ब्रह्म शब्द सबके पहले है तथापि अन्तिम ‘है’ इस क्रियापद के साथ उसका अन्वय होता है। इसी तरह हर एक पद का अन्वय करके उन्होंने दिखलाया है कि किस प्रकार गद्य-रचना पढ़ी जाती है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि इस देश में उस समय गद्य के चलन का वैसा आदर नहीं था और राममोहन राय ने और की सहायता की अपेक्षा न रख- कर यह गद्य-रचना की थी। अतएव यदि उन्हें ब्रह्मज्ञान-प्रचार और शाबों का अर्थ प्रकट करने योग्य गद्य लिखने का प्रवर्तक कहें तो शायद किसी के साथ कुछ अन्याय न होगा। फंगला-साहित्य में उनका हाथ लगने के बहुत पहले से ही गद्य-रचना होती थी। पण्डित हरप्रसाद शास्त्री महाशय के पत्र में इस बात का आभास पाया गया है।

इधर राममोहन के प्रतिद्वन्द्वी गौरीशङ्कर भट्टाचार्य भी गद्य के तत्कालीन लेखक समझे जाते हैं। तथापि यह बात निर्विवाद है कि राममोहन राय की रचना में मालिकता देखने को मिलती है और गद्य पढ़ने की पद्धति चलाने और उसके नियमों का उपदेश करने के कारण वे गद्य-लेखकों में विशेपता पाने के अधिकारी जो हो, उन्होंने ब्रह्मज्ञान के प्रचार के लिए बहुत से ग्रन्थों की रचना करके बंगला-साहित्य की घड़ी भारी उन्नति की।

साहित्य Historical Hindi Story 2
साहित्य Historical Hindi Story 2

आज जो बँगला के साहित्य में धर्म की आलोचना का प्रवल प्रवाह देख पड़ता है उसके पथ-प्रदर्शक या पितृपुरुप राममोहन राय हो हैं जो चाहं जिस तरह बॅगला-भापा में शास्त्र की व्याख्या और धर्म की आलोचना करे, उसे स्मरण रखना चाहिए कि वह इस महापुरुप के निकट ऋणी है। भीष्मपितामह की तरह महात्मा राममोहन राय भी बङ्गाल के हर एक मनुष्य से तर्पण-जल पाने के अधिकारी हैं।

वैष्णव-धर्म के अभ्युदय के समय आन्दोलन के घात-प्रतिघात से जैसे बँगला का साहित्य पुष्ट हुआ वैसे ही राममोहन राय के प्रध- ज्ञान-प्रचार के समय भी, अँगरेज़ पादरियों और एतद्देशीय कर्म- काण्डी आस्थावान् हिन्दुओं के साथ उनका वाद-प्रविवाद होने से, बँगला-साहित्य जीवन के मार्ग में और भी अग्रसर होने लगा। राममोहन राय की बनाई जो कई एक बँगला की पुस्तकें देख पड़ती हैं वे सव शास्त्र-अन्धों के अनुवाद और मूर्तिपूजक प्राचीन भट्टाचार्य पण्डितों के साथ शास्त्रार्थ करने से सम्बन्ध रखती हैं इन सव शास्त्रार्थों में सर्वत्र राममोहन राय के शास्त्रज्ञान, विद्या, बुद्धि, तर्क, विनय, गाम्भीर्य आदि सद्गुणों का पूर्ण परिचय प्राप्त होता है। मन लगाकर उन्हें पड़ने से विस्मय के साथ हो उनके ऊपर भक्ति का उदय होता है।

किन्तु जो सुमधुर सुललित भाषा आज वनवासियों के कानों में अमृत की वर्षा करती है, जिस भाषा की प्रवल शक्ति और बहुविस्तार देखकर आज हर एक बङ्गाली फूला नहीं समाता तथा जिसके श्रीसम्पादन के लिए अतुल प्रतिभाशाली बङ्किमचन्द्र ने लेखनी उठाई और उसे अनुपम सौन्दर्य प्रदान किया, जिस भापा को गम्भीरता का गौरव बढ़ाने के लिए पूर्ववङ्गनिवासी रायवहादुर कालीप्रसन्न घोप ने अपना जीवन अर्पण कर दिया और आज जिस भाषा की सेवा में चङ्गाल के बहुत-से सपूत लगे हुए हैं.

उसका सङ्गठन करने, उसे सँवारने और उसके श्वासहीन शरीर में प्राणसञ्चार करने के लिए हम किसके निकट ऋणी हैं ? अपने हृदय का रक्त चढ़ाकर, बहुत चिन्ता और परिश्रम स्वीकार कर, अपनी कन्या के समान भापा का लालन-पालन करनेवाला महात्मा कौन है सारी बङ्गाली-जाति एक स्वर से इसके उत्तर में कहेगी कि वे प्रात:स्मरणीय ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ही हैं।

उन्हींने महर्षि कण्व की तरह ‘शकुन्तला’ का पालन किया। उन्हींने महर्षि वाल्मीकि की तरह ‘सीता’ के आँसू वनवास में पोंछे। उनके आश्रय में सीता और शकुन्तला से शोभित वङ्गभापा बड़े गौरव को प्राप्त हुई। विद्यासागर का पहला गद्य-ग्रन्थ वासुदेवचरित है। इस प्रथम ग्रन्थ के सम्बन्ध में मतभेद रहने पर भी विशेष अनुसन्धान करके हमने पता पाया है कि वह अप्रकाशित वासुदेवचरित ही उनका पहला ग्रन्थ है। उसके बाद सन् १८४७ में विद्यासागर ने वेतालपञ्चविंशति का बँगला अनुवाद प्रकाशित किया।

विद्यासागर की प्रकाशित पुस्तकों में पहला ग्रन्थ यही है। उस समय के साहित्यानुरागी पण्डितों को चेतालपञ्चविंशति का अनुवाद देखकर ही इस बात का पूर्वाभास प्राप्त हो गया था कि आगे चलकर साहित्यक्षेत्र में विद्यासागर को सम्पूर्ण सफलता प्राप्त होगी। इस ग्रन्थ की रचना के बाद, फोर्ट विलियम कालेज में यह पुस्तक पाठ्य पुस्तक रूप से मञ्जूर की जा सकती है या नहीं, इस वारे में सबसे पहले परलोकगत डाकर कृष्णमोहन बनर्जी से पूछा गया। उन्हें उक्त पुस्तक अच्छी नहीं अँची। विद्यासागर ने विल्कुल ही निरुपाय होकर श्रीरामपुर के पादरियों की शरण ली।

पादरी मार्शमेन साहब ने इस आशय का एक प्रशंसापत्र दिया कि इस समय जितने बँगला के गद्य-अन्ध हैं उनमें वेतालपञ्चविंशति के अनु- वाद का सर्वोच्च स्थान है। वर्तमान बँगला भाषा के पितृस्थानीय विद्यासागर का पहला ग्रन्थ पहले इस प्रकार दो-एक धक्के खाकर अन्त को पादरी साहब के अनुमोदन से पाठ्य पुस्तक बना लिया गया। यह घटना हमें स्मरण कराती है कि जगप्रसिद्ध शेक्सपियर की वहुमूल्य रचना बहुत दिनों तक अज्ञात और अनाहत ही वनी रही और मिल्टन की ज़िन्दगी में उनके “पैराडाइज़ लास्ट” का कुछ भी आदर नहीं हुआ।

जानसन भले आदमियों की ऐसी पोशाक का सुभीता न होने के कारण लोगों से मुलाकात नहीं कर सकते थे। गोल्डस्मिथ ज़िन्दगी भर गरीवी के दुःख सहते रहे। इन लोगों के ग्रन्थों का, इस समय समादर होने पर भी, अच्छी तरह आदर होने में बहुत देर लगी। अगर ऐसा न होता तो इन सुलेखकों को आर्थिक कष्ट कभी न उठाना पड़ता। विदेश के सुलेखकों को जाने दीजिए ।

वङ्गाल के अमर कवि माइकल मधु- सूदन दत्त का, उनकी ज़िन्दगी में, आदर नहीं हुआ और मृत्यु के समय उनका किसी ने साथ नहीं दिया। अवएव विद्यासागरजी को पहले उद्योग में अगर ऐसी बातों का सामना करना पड़ा तो उसमें विचित्र ही क्या है? उनका यही यथेष्ट सौभाग्य समझना चाहिए कि पहली ही वार में वे अपने मार्ग को साफ़ करके अप्र- सर हो सके। उनकी वेतालपचीसी (बँगला) को अब लोग बड़े आदर और चाव से ख़रीदकर पढ़ते हैं। वेतालपचीसी की सौ कापियाँ ३००) की मार्शल साहव ने खरीदी थी।

इन तीन सौ रुपयों से छपाई का खर्च निकल आया था। वाक़ी कापियाँ बन्धु-बान्धवों को उपहार देने में ही चुक गई । बेतालपचोसी के पहले संस्करण की भाषा वैसी पाजल न थी। संस्कृत के कठिन शब्द उसमें भरे हुए थे। जैसे-“उत्तालतरङ्ग- मालासडुल उत्फुल्लफेननिचयचुम्बित भयङ्करतिमिमकरनक्रचक्रभीपण स्रोतस्विनीपतिप्रवाह के मध्य से सहसा एक दिव्य तरु उद्भूत हुया” किन्तु यह बात बहुत शीघ्र ही उनकी समझ में आ गई कि ऐसे लम्बे समासों की कठिन पदावली पाठकों को सहजगम्य और रुचिकर न होगी।

इसी से वेतालपचीसी के अगले संस्करणों में क्रमशः ऐसे- ऐसे स्थानों की भापा बदलकर सहज कर दी गई है। वर्तमान संस्करण की भापा प्राचल और लालित्यपूर्ण है। सुमधुर पद- विन्यास के साथ ही भाषा और भाव के समावेश में बेतालपचीसी तत्कालीन सब पुस्तकों से श्रेष्ट समझी जाती है। गद्य-भाषा के विपय में वेतालपचीसी ही वर्तमान बँगला-साहित्य का सबसे पहला ग्रन्थ कहा जाता है। सन् १८४८ में विद्यासागर ने मार्शमैन साहब के लिखे इतिहास के आधार पर बङ्गाल का इतिहास (दूसरा भाग) लिखा। उसमें अँगरेज़ों के राज्य की सूचना से लेकर उस समय के वर्तमान गवर्नर-जनरल के शासन-काल तक का वर्णन है। उसकी भी भापा प्राचल और मनोहर है। लड़कपन में, स्कूल में, यह पुस्तक हम लोग बड़े चाव से पढ़ते थे।

इसकी स्थान-स्थान पर की सुमधुरपदावली-पूर्ण भापा मुझको अभी तक कण्ठस्थ है। विद्या- सागर ने, सन् १८५० में, “चेम्बर्स विनोग्राफी’ नामक ग्रन्थ के आधार पर “जीवनचरित’ लिखा । जीवनचरित में विदेशी वीरों की कथाएँ हैं। जिन महात्माओं के आविर्भावसे पाश्चात्य जातियों का जातीय गौरव बढ़ा है, जिन्होंने आत्मसमर्पण करके अपने देश की भलाई की है, जिनके जन्म और सेवा से पृथ्वी की सारी मनुष्य- मण्डली का उपकार और लाभ हुआ है उनके कीर्त्तिकलाप और प्रातः-स्मरणीय नाम केवल ग्रीस, केवल रोम या केवल इँगलेंड की ही सम्पत्ति नहीं हैं। वे तो सारी पृथ्वी के हैं। ऐसे ही महा- स्माओं की कीर्त्तिगाथा “जीवनचरित” है।

जैसे पदमाधुर्य के वारे में वेतालपचीसी की प्रसिद्धि है वैसे ही भापा की ओजस्विता के बारे में “जीवनचरित की। उस समय सुन्दर, सुमधुर, सुश्राव्य बँगला के आदर्श यही दोनों ग्रन्थ समझे जाते थे। “जीवनचरित”, “आख्यानमञ्चरी” और “चरितावली” आदि पुस्तकों में विदेशी चरित्रों के ही लिखने के कारण कुछ लोग यह कटाक्ष करते हैं कि वे विदेशियों के पक्षपाती थे; किन्तु यह कटाक्ष उचित नहीं है। वालकों के पढ़ने लायक सहज ही समझ में आ जानेवाली देशी आख्यायिकाओं का संग्रह अगर उस समय सम्भवपर होता तो विद्यासागर उसकी कभी उपेक्षा न करते। इसके अतिरिक्त विद्या- सागरजी तो इस सिद्धान्त के आदमी थे-“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।

साहित्य Historical Hindi Story 1
साहित्य Historical Hindi Story

उदारचरितानान्तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥” वे जैसे दान में मुक्तहस्त थे वैसे ही साधुचरित के समादर में भी सच्चे हिन्दू की तरह उदारता के उच्च शिखर पर विराजमान थे। हिन्दूचरित्र का उच्च आदर्श उनके हर एक काम में देख पड़ता है। सन् १८५१ में, “चेम्बर्स रूडीमेन्ट्स् आफ नालेज’ नामक अँगरेज़ी पुस्तक के आधार पर उन्होंने “शिशुशिक्षा” का चौथा भाग (बोधो- दय) बनाया। इस पुस्तक में सहज रीवि पर सरल भाषा में पदार्थ- विभाग, वस्तु-विचार, काल-विभाग और संख्या आदि का वर्णन है। बहुत सी जानने योग्य बातें अत्यन्त सरल भाव से बच्चों को समझाने के लिए ऐसा उपयोगी ग्रन्थ, बँगला में, शायद ही दूसरा हो।

इसके बाद सन् १८५५ में विद्यासागर ने कालिदास के अभि- ज्ञानशाकुन्तल के कथाभाग के आधार पर एक बहुत ही उपादेय सुखपाठ्य ग्रन्थ लिखा और उसका नाम रक्खा “शकुन्तला। शकु- न्तला से बँगला-साहित्य की शोभा बढ़ गई। शकुन्तला में विद्या- सागर की लिपिचातुरी, रचनामाधुरी और पदलालित्य देखकर पाठक- गण मुग्ध हो गये और चारों ओर उनकी प्रशंसा फैल गई। विद्यासागर ने इसी साल अपनी सुप्रसिद्ध “विधवा-विवाह-विष- यक पुस्तक’ बनाकर प्रकाशित की। विधवा-विवाह-सम्बन्धी अध्याय पढ़ने से ज्ञात होगा कि इस पुस्तक के प्रकाशित होने पर कैसा आन्दो- लन हुआ था।

विधवा-विवाह-विषयक आन्दोलन में लगे रहकर और साथ ही कालेज का काम भी ठीक तौर पर करते रहकर विद्या- सागरजी पुस्तकें लिखने का क्रम भी जारी किये हुए थे । सन् १८५६ में विधवा-विवाह का आन्दोलन सारे बङ्गाल में इलचल डाले हुए था। उस समय सब बङ्गालियों को विद्यासागर की पड़ी हुई थी। कोई उनके पक्ष में था और अनेक उनके प्रतिपक्षी थे और विद्यासागर उस हलचल के बीच में, उस समाज-तरङ्ग के फेनपुज के भीवर, विधवा-विवाह-सम्मतिरूपी घोर आँधी से आन्दोलित विपत्ति-पूर्ण समाज की छाती पर बैठे बालकों के पढ़ने लायक पुस्तकें लिख रहे थे।

“वर्णपरिचय” के दो भाग, “कथामाला” और “चरितावली” की रचना इसी साल हुई। विद्यासागरजी जब जिस काम में हाथ लगाते थे उसी में उनकी असाधारण शक्ति का परिचय प्राप्त होता था। इस प्रकार के धैर्य, शान्तभाव और तेजखी उद्धत प्रकृति से विद्यासागर की विचित्रता स्पष्ट झलकती है। “डेविड हेयर’ की तरह “बेथून” के मरने पर भी कलकत्ता- वासियों को बड़ा शोक हुआ । बहुत लोगों के उद्योग से बेथून के स्मारक में “बेथूनसोसाइटी” नाम की एक सभा स्थापित हुई। इस सभा की स्थापना में विद्यासागर का प्रधान उद्योग था।

इस सभा में अब तक बहुत से विषयों की आलोचना हो चुकी है और यहाँ प्रबन्ध पढ़ने या व्याख्यान देने से अनेक विद्वानों की प्रतिष्ठा हो गई है। स्वर्गीय केशवचन्द्र सेन को जिस व्याख्यान से विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त हुई उस “ईसा खीष्ट, यूरोप और एशिया” विषयक व्याख्यान की रङ्गभूमि वेथूनसोसाइटी ही है। इसी सभा के एक अधिवेशन में विद्यासागर ने “संस्कृत-भाषा, संस्कृत-साहित्य और शास्त्र विषयक निवन्ध पढ़ा था । यह एक समालोचना-अन्य है।

संस्कृत के ग्रन्थों और ग्रन्थकारों की संक्षिप्त और सङ्गत समालोचना ही इस छोटी सी पुस्तक का उद्देश्य है। किन्तु आश्चर्य की बात है कि इसमें वाल्मीकि और व्यास के दोनों अमूल्य ग्रन्थों (रामायण और महाभारत) के बारे में कुछ भी नहीं लिखा गया। इसका ठीक कारण ढूंढ़ निकालना कठिन है।

जान पड़ता है, लेख छोटा था और उसे पढ़ने का समय थोड़ा होना ही इसका मुख्य कारण है। किन्तु ऐसा होने पर भी उक्त दोनों ग्रन्थों का उल्लेख भी न करना न्याय की दृष्टि से उचित नहीं हुआ। इसके बहुत पहले से विद्यासागर की कलकत्ता ब्राह्मसमाज के सभासदों के साथ जान-पहचान हो गई थी। अक्षयकुमार दत्त, राजनारायण वसु, महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर आदि महानुभावों से हेलमेल बढ़ने का एक विशेप कारण आ पड़ा।

Part 1, Part 2 and Part 3 Link

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जैसे की आपको पता है यह कहानी छोटी नहीं है तो हमने इसे तीन हिस्सों (अंश) में विभाजित किया हुआ है तो यह इस पूरी कहानी का दूसरा विभाग था. आपको इसके बाकि दोनों विभाग भी हमारी Website में मिल जायेंगे या पोस्ट के निचे ही आपको लिंक दिए हुई होगी। तो आप वह क्लिक करके इसके बाकि के विभाग पढ़ सकते है.

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