“साहित्य” Historical Hindi Story Part 1

आज हम बात करने वाले है एक हिंदी ऐतिहासिक कहानी के बारे में जो की “साहित्य”जुडी है और मुझे विश्वाश है की शायद आपको यह जरूर पसंद आएंगी। यह कहानी बहोत साल पुराणी है शयद अभी आप जो कोई भी पढ़ रहे है उनके जन्म के पहले की जब भारत आज़ाद नहीं हुआ था.

यह कहानी बहोत ही लम्बी होने वाली है, क्यों की इससे जुड़े सभी पात्र और किस्सों को अगर हमने संक्षिप्त रूप दे दिया तो शायद आपको इसे पढ़ने में उतना मजा नहीं आएगा। इसी लिए हमें इसे ओरिजिनल रूप में ही रखा है और इसे हमने तीन हिस्सों में विभाजित किया है. इससे आप सभी पढ़ने में और आसानी होगी।

“साहित्य” अंश-1

जातीय जीवन के प्रधान लक्षण दो हैं-धर्म और भापा । जिस जाति का एक धर्म नहीं है, जिस जाति का समाज-शरीर धर्म की आलोचना में सिर से पैर तक उच्चसित नहीं होता, जिस जाति के धर्म-सम्बन्धी आन्दोलन की लहरों से समाज-शरीर में सजीवता की झलक नहीं पाई जाती वह जाति मुर्दा है।

उस जाति से जातीय जीवन के सङ्गठन में सहायता मिल ही नहीं सकती। वैसे ही माता की गोद में दूध पीते-पीते मनुष्य सवसे पहले जिस भाषा में माता को सम्बोधन करना या पुकारना सीखता है, जिस भाषा के सरल और मधुर शब्दों का उच्चारण करते-करते जिह्वा की जड़ता दूर हो जाती है, तथा जिस भाषा में अपने क्षुद्र जीवन के शोक और दुःख को प्रकाशित करता हुआ बच्चा रोता है वही उसकी मातृभाषा जिस भाषा में छोटे-छोटे बालक-बालिकाएँ आनन्द-मग्न होकर अपने जय-पराजय का परिचय देते हैं, जिस भाषा को मनुष्य बचपन के क्रीड़ा-कौतुक और आमोद-प्रमोद के साथ-साथ सीखता है, जिस भाषा में आदमी अपने आनन्द और कष्ट की कहानी अपने वन्धु-वान्धवों को सुनाता है, वही उसकी मातृभाषा है। और मातृभाषा एक ही चीज़ है।

साहित्य Historical Hindi Story 3

जो जाति अभाग्यवश मातृपूजा करना नहीं सीखती वह मातृभाषा का आदर करना भी नहीं जानती । जिस जाति की मातृभाषा एक नहीं है, जिस जाति के लोग एक माता भी हुई। शब्द और एक स्वर से माता को पुकार नहीं सकते उनके जातीय जावन की नाट्यशाला में उपस्थित होने में अभी बहुत विलम्ब है। हर एक वालक विधाता के दिये हुए राजचिह्न को धारण कर पृथ्वी पर आता है। मामूली घर में, मामूली लोगों में उत्पन्न होने पर भी तत्त्वदर्शी लोग लक्षणों को देखकर उसके भावी कार्यों के सम्बन्ध में भविष्यवाणी कर देते हैं। किन्तु सब तरह के सुलक्षण रहने पर भी अक्सर किसी-किसी के जीवन में, ग्रहदशा के फेर से, शीव शुभ दिन नहीं उपस्थित होता।

यही दशा बँगला भाषा की प्रवल देवभाषा संस्कृत के पेड़ के नीचे ही इसे अपना बाल्यकाल विताना पड़ा। बङ्गाली-जीवन को प्रथमावस्था में, वजाल के सामाजिक इतिहास के शैशवकाल में, स्मृति-शास्त्र-संस्कारक पं० रघुनन्दन भट्टाचार्य और गीतगोविन्द-रचयिता जयदेव गोस्वामी आदि प्रातःस्मरणीय महात्मा जन्म लेकर मातृभूमि का मुख उज्ज्वल कर गये हैं। किन्तु उन सक्ने संस्कृत की आलोचना में ही जन्म विता दिया; उनके अन्य भी संस्कृत में ही हैं। उन्होंने अपना स्नेह, ममता और उद्यम सव संस्कृत की सेवा में लगा दिया। उन्होंने मातृभापा बँगला की पुष्टि कुछ भी नहीं की। बँगला भाषा का साहित्य प्राचीन युग के नीतिकुशल निपुण लेखकों की सेवा से वञ्चित है।

बॅगला भापा की उन्नति के लिए वङ्गाल के सर्वसाधारण लोगों के पढ़ने लायक ग्रन्थों की रचना करने में पहले-पहल जो लोग अग्रसर हुए हैं उनमें सबसे आगे विद्यापति, चण्डीदास, उनके वाद चैतन्यभागवत के लेखक वृन्दावनदास, फिर चैतन्यचरितामृत के लेखक कृष्णदास कविराज और चण्डीकाव्य के लेखक मुकुन्दराम चक्रवर्ती आदि के नाम लिये जाते हैं। इससे यही स्पष्ट होता है कि वैष्णवधर्म के अभ्युदय के बहुत पहले, बँगला भापा, . . भारतवर्ष में आर्यजाति के प्रथम अभ्युदय-काल की भाषा की तरह मौखिक ही थी। ग्रन्थरचना करके मनुष्यों की उक्तियों को स्थायी बनाने की कुछ भी चेष्टा नहीं की जाती थी। अतएव विद्यापति और चण्डीदास बंगला-अन्धकारों के पथप्रदर्शक और गुरु कहे जाते हैं। किन्तु इस विपय में इस समय मतभेद हो गया है कि विद्यापति बङ्गाली कवि थे।

डाकृर ग्रियर्सन ने “विहार-डायलेक्टर” नाम की पुस्तक रचकर यह प्रमाणित कर दिया है कि विद्यापति मैथिल कवि थे। उनकी सब कविताएँ मैथिली भाषा में हैं। उनकी मृत्यु के बाद बङ्गालियों ने उन कवि- ताओं को फंगला के साँचे में ढाल लिया है। यह बात असम्भव नहीं है और अगर यह सच हो तो विद्यापति को हम बगला-अन्ध- कारों का पथप्रदर्शक या आदि-गुरु नहीं मान सकते। किन्तु *गला-साहित्य के वाल्यवन्धु और यौवन-सखा विज्ञवर राजनारायण वसु ने अपनी बॅगला-भाषा-सम्बन्धी वक्तृता के शुरू में ही लिखा है- “ईसा की सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री हियनसाँग भारतवर्ष में आया था और वह बङ्गाल, विहार और उत्तर-पश्चिम अञ्चल के कुछ अंश में एक ही भाषा का व्यवहार देख गया था। केबल आसाम और उड़ीसा की भापा कुछ भिन्न थी।

यह मागधो-प्राकृत भाषा से उत्पन्न एक तरह की पुरानी हिन्दी-भाषा थी। हिन्दी और बँगला दोनों ही इस एक ही भाषा से उत्पन्न हुई हैं। इसी कारण यहाँ के प्राचीन कवियों की भाषा में बहुत अधिक हिन्दी मिली विद्यापति मैथिली-हिन्दी के कवि हैं। उनकी भाषा न तो प्राकृत-हिन्दी है और न बँगला। परवर्ती वैष्णव कवियों ने विद्यापति की कविता को बॅगला-लिबास पहनाया है।” डाकर ग्रियर्सन और राजनारायण बाबू की उक्ति का फल एक ही है। भेद यही है कि प्रियर्सन साहव विद्यापति को वङ्गाली कवि नहीं कहते और राजनारायण बाबू कहते हैं कि विद्यापति के होने के पहले बङ्गालियों की कोई जुदी भाषा नहीं थी, मैथिली ही उस समय बङ्गालियों की भाषा थी।

उक्तियाँ भिन्न होने पर भी मतलव एक ही है। ऐसे मतविरोध की अवस्था में हमारी राय यह है कि बङ्गाली लोग विद्यापति को उनके प्राप्य सम्मान से एकदम वञ्चित न कर दें। विद्यापति के समय में बगला-भाषा की खतन्त्रता की सूचना हुई थी। वैष्णव कवियों की रचना वर्तमान बँगला-भापा से भिन्न और बहुत कुछ हिन्दो-मिली होने पर भी यह बंगला के सिवा और कुछ नहीं कही जा सकती । विद्यापति के मैथिल कवि होने की वात को प्रियर्सन साहव और राजनारायण वाबू दोनों ने स्वीकार किया है। वे विहारी हैं, मैथिल-कवि हैं, बँगला में उनकी कोई रचना होने का प्रमाण नहीं पाया जाता। उनका जो कुछ है वह मैथिली भाषा की कविता का बंगला-संस्करणमात्र है।

इस दशा में यदि उन्हें वङ्गाली कवियों का अगुआ और बँगला-अन्थकारों का पथप्रदर्शक न मानें तो कोई दोप की बात न होगी। हमारी समझ में तो चण्डीदास और गोविन्ददास ही बॅगला के आदि-अन्धकार हैं। अस्तु । विद्यापति, चण्डीदास और गोविन्ददास, ये श्रीगौराङ्ग- देव के आविर्भाव के कुछ पहले हुए। उस समय जो इन्होंने लिखा वह सब कृष्णलीला से सम्बन्ध रखता है। ४०० बरस पहले बङ्गाल की सामाजिक दशा बहुत ही शोच- नीय हो रही थी। सब आदमी निर्जीव, जड़प्राय हो रहे थे। खाने- पीने-सोने में ही उनका समय बीतता था।

वे अपने अमूल्य जीवन को इसी तरह विता देते थे। उस समय बङ्गाल की सामाजिक दशा में परिवर्तन न होता तो समाज-शरीर का प्राणवायु थोड़े ही समय में लड़ा दी। निकल जाता। विधाता अपने महान् कार्यों का सूक्ष्म सूत्र जिस रास्ते से चलाते हैं वह मनुष्य की बुद्धि-विवेचना से परे होता है। १४०७ शकाव्द (सन् १४८५ ई० ) में बङ्गाल की भूतपूर्व राजधानी और धर्मक्षेत्र नवद्वीप में नवद्वीपचन्द्र का जन्म हुआ।

उनकी विद्या- बुद्धि का प्रभाव बहुत फैल गया ! उनका अलौकिक सुन्दर शरीर और गोरा रङ्ग दर्शनीय था। ऐसे सुरूप और गुणी पुरुप ने मृतकल्प वङ्गालियों के जीवन में नवीन शक्ति का सञ्चार करने में अपनी जान जननी शची देवी के आँसुओं की परवा न करके, प्यारी स्त्री विष्णुप्रिया के सुदृड़ प्रेमबन्धन को काटकर, उन्होंने लोकसेवा में अपना जीवन लगा दिया; धर्म की प्रवल तरङ्ग उठाकर वे उसमें डूब गये।

साहित्य Historical Hindi Story 2
साहित्य Historical Hindi Story

उन्होंने अपने साथ ही देश के अनेक लोगों को भी धर्मभाव के सागर में मग्न कर दिया। इस धर्म के आन्दोलन में दो तरह के लेखक उत्पन्न हुए। कुछ लोग वैष्णव-धर्म के मधुर भाव के प्रचार में, काव्य-रचना करने में, कमर कसकर खड़े हो गये । वैष्णव-साहित्य इसी आन्दोलन का एक अंश है। वैष्णव-धर्म के बहुल प्रचार से जब चारों ओर उलट-पुलट हो रहा था, जव जाति और धर्म का भेद उड़ गया और सभी उच्च धर्म के अधिकारी बतलाये जाने लगे, जब वैष्णव लोग ऐसे उचा भाव का प्रचार करने लगे कि “चाण्डालोऽपि द्विजश्रेष्ठः हरिभक्तिपरायण.”

“जाति पाँति पूछ ना कोय । हरि का भजै सो हरि का होय ” तब कुछ शाक्त लोग पैदा हुए और वे अपने पक्ष का समर्थन करने के लिए बहुत-से अन्य रचने लगे। इन शाक्तों और वैष्णवों की प्रतिद्वन्द्विता से बॅगला का साहित्य सङ्गठित होने लगा। इस समय की बङ्गाली भाषा दोनों ओर से परिपुष्ट होने लगी। एक ओर चैतन्य-भागवत, चैतन्यमङ्गल, चैतन्यचरितामृत, भक्तमाल आदि छोटे और बड़े वैष्णवों के प्रन्थ लिखे जाने लगे तो दूसरी और कविकङ्कण मुकुन्दराम चक्रवर्षी आदि लेखक चण्डीकाव्य ऐसे प्रन्यों से बँगला-भापा की श्रीवृद्धि करने में अग्रसर हुए।

कविकङ्कण के बारे में बाबू राजनारायण वसु ऐसे प्रवीण साहित्यानुरागी पुरुप की राय है कि वे राजा कृष्णचन्द्र राय के सुसभ्य सभासद भारतचन्द्र और वङ्ग के अमर कवि माइकल मधुसूदन दत्त से भी कपोलकल्पित रचना के बारे में बढ़े-चढ़े हैं। मुकुन्दराम को कोमल कविताएँ ऐसी सरल हैं कि समाज के सब लोग उन्हें सहज में समझ लेते हैं। यही उनका प्रधान गुण है। उनकी रचना-परिपाटी और कविता मधुर भी है।

इसी से मुकुन्दराम की कविता को “सोने में सोहागे का सौभाग्य प्राप्त है। उन्होंने खुद अपनी कविता को “स्वर्णमण्डित गज-दन्त’ कहा है। एक समालोचक की राय है कि उनकी यह अपनी उक्ति होने पर भी बहुत ही समीचीन है। इसके उपरान्त बङ्गाल के अमर कवि कृत्तिवास और काशीराम ने रामायण और महाभारत बँगला में लिखकर हमको अपना चिर-मणी वनाया । इनके ऋण को बङ्गाली लोग किसी तरह चुका नहीं सकते। वङ्गाल में घर-घर मर्द-औरत लड़के-लड़की सव रामायण और महा- भारत को पढ़ते रहते हैं। इसी से इन दोनों महात्माओं को भक्ति-पूर्वक याद करना हमारा परम कर्त्तव्य है। हमारे देश के छोटे लोग अन्यान्य देशों के छोटे लोगों से नम्र और धर्मात्मा हैं।

इसका प्रधान कारण रामायण और महाभारत का उनमें प्रचार होना ही है। पाश्चात्य जातियों के धर्म-ग्रन्थ बाइविल से जो उद्देश्य नहीं सिद्ध हुआ और भारत में वेद, उपनिपद्, पुराण आदि से जो काम सुसम्पन्न नहीं हो सका वही काम इन दो महाकाव्यों ने बङ्गाल में कर दिखाया। समाज-शरीर के भीतर, बहुत सी विभिन्नताएँ और विचित्रताएँ रहने पर भी जो जातीयता की शेप रेखा अभी तक देख पड़ती है उसकी चुपचाप रक्षा करनेवाले यही दो महाकाव्य-रामायण और महा- भारत-हैं।

बङ्गाल में कृत्तिवास और काशीराम और भारत भर में वाल्मीकि और व्यास को यह श्रेय प्राप्त है । इसके बाद वैष्णवों और शैवों के बहुत-से ग्रन्थ बने, जिनका केवल उल्लेख भी यहाँ पर असम्भव है। इनके बाद बँगला भापा की सेवा करनेवालों में रामप्रसाद और राय गुणाकर का नाम विशेष रूप से उल्लेख के योग्य है। रामप्रसाद श्यामा के उपासक थे और उन्हीं के सम्बन्ध के कुछ गीतों की रचना ही उनकी इस कीर्ति का कारण है।

उनके सात्त्विकभाव- पूर्ण सरल गीतों को मीठे “प्रसादी” स्वर में बङ्गाल के बच्चे-बूढ़े सब गाते हैं। उन गीतों से सात्त्विक प्रसन्नता और तृमि प्राप्त होती है। कविरसन ने भी “विद्या-सुन्दर” लिखा है किन्तु राय गुणाकर के “अन्नदामङ्गल” के अन्तर्गत “विद्यासुन्दर” को ही विशेष प्रसिद्धि प्राप्त हुई है। राय गुणाकर भ्रमर की तरह अनेक पुष्पों से मधु- सञ्चय करके जो मधुचक्र ( मक्खियां का छत्ता) बना गये हैं वह वङ्गालियों के लिए सदा मधुमय बना रहेगा। जिस समय का यह ज़िक्र है उस समय ग्रन्थकार ग्रन्य बनाकर बड़े कष्ट से जुगाकर उसकी कापी रखते थे।

आजकल लोग बहुमूल्य वस्तुओं को जिस तरह हिफ़ाज़त से रखते हैं उससे भी अधिक साव- धानी के साथ उस समय हस्तलिखित ग्रन्धों की रक्षा की जाती थी। जिसको ज़रूरत या शौक होता था वह अन्धकार की खुशामद करके बहुत क्लेश उठाकर बहुत दिनों में उसकी नकल कर लेता था। इस प्रकार उस समय ग्रन्थ का प्रचार होना बहुत ही कठिन था। ऐसी दशा में यह मानना ही पड़ेगा कि उस समय के ग्रन्थकार लोग धन की आशासे प्रन्थ नहीं लिखते थे। वे अपनी प्रसन्नता के लिए, अपनी रुचि और प्रकृति के अनुरूप मार्ग में, एक-एक पग अग्रसर होते थे।

जिनमें अन्धरचना की प्रवृत्ति प्रवल होती थी वे ही अपनी-अपनी मित्रमण्डली की प्रसन्नता या सन्तोप के लिए ग्रन्थ लिखते या बनाते थे। किन्तु उससे लोकशिक्षा को विशेष सहायता नहीं मिलती थी। उस समय, जव कि छापे का बिलकुल प्रचार न था, अन्धकारों और साहित्य का कल्याण चाहनेवालों की इच्छा पूर्ण होने का एक उपाय था। ग्रन्थकार लोग कृष्णचरित, रामायण, महाभारत आदि के आधार पर पुस्तकें बनाते थे। कुछ लोग ऐसे भी थे जो बाजों के साथ इन सब ग्रन्थों के विषय गा-गाकर लोगों को सुनाते फिरते थे।

इसके सिवा कथा बाँचने वालों और नाचने-गानेवाली मण्डलियों ने भी बँगला-साहित्य के प्रचार में यथेष्ट सहायता पहुँचाई है। अब हम संक्षेप में इसी बात का उल्लेख करेंगे कि किस शुभ- मुहूर्व में किस महात्मा के द्वारा किस उपाय से यह लोक-शिक्षा का मार्ग साफ़ हुआ है, किन-किन कार्यों से वर्तमान गला भापा की सृष्टि हुई है, और सहसा किस दैवी-शक्ति को प्राप्त करके बँगला का साहित्य अपनी किशोर अवस्था वीतने के पहले ही इतनी शक्ति- सामर्थ्य, इतनी विचित्रता और इतनी विस्तृति के साथ प्रवल वेग से उन्नति के मार्ग में अग्रसर हो रहा है।

बङ्गाल में अँगरेज़ी राज्य का सूत्रपात हुए कुछ अधिक डेढ़ सौ वर्ष बीते हैं। किसी नई जगह पर पदार्पण करते ही करते उस स्थान के प्रभावों को मिटाने और उस जगह को सब प्रकार मनुष्य के रहने लायक बनाने के लिए उपाय करना अँगरेज़-जाति का खभाव-सिद्ध गुण खोजने से हर-एफ जाति में दोप दिखाई देंगे। अँगरेज़ों में भी दोप हो सकते हैं। किन्तु यह मानना ही पड़ेगा कि जातीय उन्नति के लिए जिन गुणों की ज़रूरत हुआ करती है वे, अधिक मात्रा में, उनमें मौजूद हैं। राज दण्ड से दण्डित अपराधी अँगरेज़ों को देश-निकाला होता था तो वे आस्ट्रेलिया को भेज दिये जाते थे।

रूस में ऐसे अपराधी साइ- वेरिया को भेज दियं जाते हैं और भारत में ऐसे अपराधी.अण्डमन टापू में पहुँचा दियं जाते हैं। किन्तु आस्ट्रेलिया में निर्वासित अँगरेज़ों और उनके वंशधरी ने सभ्य-जगत् की सुख-शृद्धि के काम में बड़ी सहायता पहुँचाई है। यह यात निर्वासित रूसियों और भारतवासियों में नहीं पाई जाती। जिस जाति के अपराधी भी ऐसी विचित्र उन्नति कर सकते हैं वह जाति, हज़ार दोप होने पर भी, आदरणीय है।

ऐसी पूजनीय अँगरेज़-जाति की इस विचित्र जातीय उन्नति को एक प्रवल तरङ्ग अटलांटिक और भारत-महासागर को नांधकर, वहिया के पानी की तरह, अनेक मार्गो से भारत में भी पहुँच गई। उसी तरङ्ग के घात-प्रतिघात से जो श्वेत फेन-पुश्न उठा था उसी ने सारे भारत को उज्ज्वल बना रक्खा है। इस अँगरेज़ों के आगमन से जिन मङ्गलकार्यो की शुभ सूचना हुई उनमें एक प्रधान कार्य छापखानों की स्थापना है। सन् १७७८ में चार्ल्स विल्किन्स नाम के एक अँगरेज़ ने सबसे पहले बहुत क्लश उठाकर छापे के लायक बँगला-अक्षर बनाये।

इन अक्षरों की सहायता से हालहेड नामक एक अँगरेज़ का बनाया हुआ सबसे पहला बँगला का व्याकरण छापा गया। इन दोनों चिरकृतज्ञता-भाजन विदेशी महात्माओं के निकट बँगला भापा और उसके हितैपी लोग सदा ऋणी बने रहेंगे। विल्किन्स और हालहेड वर्तमान शीव्रगामी गला-साहित्य के अतिवृद्ध प्रपितामह होने के कारण बङ्गालियां के पूजनीय हैं जो लोग किसी कार्य के सुफल का ही सम्भोग करते हैं वे उस कार्य की सूचना करनेवालों के अध्यवसाय, आत्म-त्याग और कष्टसहि- प्णुता की रत्ती भर भी धारणा अपने मन में नहीं कर सकते।

ये दोनों महात्मा अँगरेज़ थे, इसी से शायद ऐसे असाध्यसाधन के लिए साहस करके छः साल तक इस देश की अनेक भापाएँ सीख कर, उन भाषाओं के अक्षर एकत्र कर, उन्हें परस्पर मिलाकर, इन्होंने बँगला-टाइप बनाया। इसी से कहते हैं कि दृढ़-प्रतिज्ञ अँगरेज़-जाति धन्य है। उक्त दोनों सज्जनों ने निःस्वार्थभाव से नगण्य उपेक्षित बँगलासाहित्य के उद्धार का प्रयत्न किया; इसी से आज हम अनेक दैनिकों, साप्ताहिकों और मासिकपत्रों तथा ग्रन्थों का ऐसा प्रचार देख पाते हैं।

सन् १७६३ में एच० पी० फ़ास्टर नामक एक अँगरेज़ ने लार्ड कार्नवालिस के संगृहीत और अनुमोदित आईनों का बॅगला-भाषा में अनुवाद किया। इन्हीं सज्जन ने बँगला का सबसे पहला ‘कोप’ तैयार किया। आईनों का बङ्गानुवाद ही बंगला में गयमन्य-रचना की सूचना है। यह पुस्तक श्रीरामपुर में, सन् १८२६ में, दूसरी वार छपी थी। श्रीरामपुर के पादरियों का मुख्य उद्देश्य ईसाई-धर्म का प्रचार होने पर भी उसी कार्य के सभी के लिए उन्होंने पहले-पहल बंगला का छापाखाना खोला था। ये ही लोग बँगला-टाइप के अधिक प्रचार के उत्साहदाता और बँगला भापा के संवाद-पत्रों और ग्रन्थों की रचना के पथप्रदर्शक हैं। और, इसी से हम इनके चिर- कृतज्ञ बने रहेंगे।

जिस तरह चैतन्यसम्प्रदाय के वैष्णवों के द्वारा बँगला में पद्यरचना की उन्नति शुरू हुई थी उसी तरह ईसाई पाद- रियों के द्वारा बॅगला गद्य का प्रचार शुरू हुआ। कृत्तिवास की रामायण और काशीदास का महाभारत जो सुलभ मूल्य में बिक- कर बङ्गाल में घर-धर फैल गया, वह भी इन्हीं पादरियों के उद्योग और अध्यवसाय का फल है। जिस समय की बात लिखी जा रही है उस समय पूर्वोक्त हालहेड, विल्किन्स, फ़ास्टर, केरी, मार्श- मेन, कोलक और सर विलियम जोन्स आदि अनेक अँगरेज़ सज्जन संस्कृत, पॅगला, हिन्दी, उड़िया आदि इस देश की भापायों के अनुशीलन और उन्नति की विशेप चेष्टा में लगे हुए थे।

साहित्य Historical Hindi Story 1
साहित्य Historical Hindi Story

ईसाई मिशनरियों का काम शुरू होने के बाद और महात्मा राममोहन राय के बँगला-साहित्य की सेवा में नियुक्त होने के पहले, सन् १८०० में, अँगरेज़ सिविलियनों को देशी भाषाओं की शिक्षा देने के लिए कलकत्ते में फोर्ट विलियम कालेज की स्थापना हुई। इस कालेज में साहवों को बँगला की शिक्षा देने के लिए कई एक बॅगला के गद्य-अन्य बनाये गये। इन अन्यों की बँगला बड़ी विचित्र थी।

इस समय के बङ्गाली पाठक उस भापा को पढ़कर अपनी हँसी न रोक सकेंगे। राजीवलोचन का लिखा “कृष्णचन्द्रचरित” पहले-पहल सन् १८०५ में छपकर प्रकाशित हुआ था। रामराम वसु का बनाया “प्रतापादित्यचरित” पहले-पहल सन् १८०६ में छप- कर प्रकाशित हुआ था। ऐसे ही उड़ीसे के रहनेवाले मृत्युजय विद्या- लङ्कार की बनाई “राजावली” सन् १८०८ में और “प्रबोधचन्द्रिका सन् १८१३ में पहले-पहल छपकर प्रकाशित हुई थी। बहुत चेष्टा करने पर भी इनके बाद बँगला के गद्य-अन्य हमको नहीं मिले। ये सब ग्रन्थ इस समय बहुत ही कम पाये जाते हैं।

शायद कुछ वर्षों के बाद पङ्गाल में कहीं ये प्रन्थ नहीं मिलेंगे। किन्तु विश्वस्त सूत्र से मालूम हुआ है कि लन्दन में शाही लाइब्रेरी में ये पुस्तकें बड़े यत्न से सुरक्षित है। यही कारण है कि वर्तमान समय में अँगरेज़-जाति ज्ञान और गुण में हमारी अपेक्षा श्रेष्ठ जाति समझी जाती है। हम अपनी बहुमूल्य वस्तुओं को यत्न से रखना नहीं जानते, और वे लोग अपनी चीज़ों के अलावा पौरों की भी चीज़ों को जमा करके अपने यहाँ रखते हैं। कृष्णचन्द्रचरित सन् १८११ में लन्दन में छपा और प्रका- शित हुआ था। आश्चर्य तो यह है कि उस समय भी इंग्लैंड में बँगला पुस्तक छापनेवाले और उसके प्रूफ देखनेवाले लोग मौजूद थे । अँगरेज़ लोग ऐसे उद्यमशील और कार्यतत्पर होने के कारण ही देश-देश में विचरते हैं और सर्वत्र सिद्धि प्राप्त करके अपनी जाति का गौरव बढ़ाते हैं।

और हम, इसी गुण के न होने से, अपने ही घर में मुर्दो की तरह पड़े हुए हैं। बहुत लोगों की धारणा यह है कि ब्राह्मसमाज के संस्थापक महात्मा राममोहन राय ही बॅगला-गद्य-रचना के पथ-प्रदर्शक है। लोगों की ऐसी धारणा होने के यथेष्ट कारण मौजूद हैं और इस ‘धारणा में कुछ सत्य भी है। राममोहन राय काम-काज छोड़कर सन् १८१४ में कलकत्ते में आकर रहने लगे । सन् १८१५ में उन्होंने वेदान्तसूत्र का वङ्गानुवाद प्रकाशित किया।

उस समय भी पॅगला- भापा की बड़ी ही शोचनीय दशा थी। विद्यालय में पढ़ाने के लिए वनाई गई ऊपर लिखी पुस्तकों के अलावा केवल अन्ध-प्रणयन और अन्ध-प्रचार के उद्देश्य से कोई बँगला-गद्य-अन्धों की रचना करनेवाला न था। किन्तु यह बात जान पड़ती है कि जगह-जगह गला के गद्य-अन्य रचे और सुरक्षित रखे जाते थे। इस सम्बन्ध में सब तरह के संशय दूर करने की इच्छा से मैंने बङ्गाल-गवर्नमेंट के लाइब्रेरियन अद्धेय हरप्रसाद शास्त्रीजी को एक पत्र लिखा था। उन्होंने अनुग्रह करके मेरे पत्र का जो उत्तर दिया वह यहाँ पर उद्धृत किया जाता है।

श्रीश्रीदुर्गा सहाय। नहाटी, १९ जून, १८६४

विहित विनयानुनयपुरस्सरं निवेदनमेतत् । महाशय, अनेक लोगों की धारणा यह है कि स्वर्गीय महात्मा राममोहन राय ही बॅगला-गद्य के जन्मदाता हैं। उन्होंने सबसे पहले बंगला में बहुत-से गद्य-प्रन्धों की रचना की है। यह वात सच होने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि उनसे पहले गद्य नहीं लिखा जाता था। गद्य लिखने में राममोहन राय के प्रतिद्वन्द्वी स्वर्गीय गौरीशङ्कर ने भी बहुत से अन्य लिखे हैं।

अगर राममोहन को ही गद्य का जन्मदाता मानें तो यह प्रश्न होता है कि गौरीशङ्कर ने गद्य लिखना कहाँ सीखा ? इस कारण इसमें कोई सन्देह नहीं कि गद्य-रचना-प्रणाली राममोहन राय के बहुत पहले से प्रचलित थी। गद्य-रचना की प्राचीनता का पता लगाने में वैपायों के अन्धों से सहायता अवश्य मिलेगी, यह समझकर मैने चैतन्यप्रभु-सम्बन्धी अनेक ग्रन्थों का अध्ययन किया। उसमें देख पड़ा कि श्रीचैतन्य के समय में चिट्ठी-पत्री तक संस्कृत में लिखी जाती थी।

खोजने से भी मुझ बँगला में लिखे किसी पन का पता नहीं मिला। महाराज नन्दकुमार के कारावास के समय लिखे हुए पत्र ही बॅगला-गद्य की प्रथम रचना जान पड़ते हैं। कम से कम उनसे पहले की कोई गद्यरचना अब तक नहीं पाई गई। नन्दकुमार की बॅगला में भी उर्दू शब्द बहुतायत से हैं और वह कचहरी की भाषा के समान नन्दकुमार के बहुत पहले से ही अदालती. कागज़ात गद्य में लिखे जाते थे।

जान पड़ता है, अदालती काग़ज़ों से गद्यरचना सीखने के कारण नन्दकुमार की भापा ऐसी हुई थी। किन्तु अदालती काग़ज़ और पत्र आदि गद्य में लिखे जाने पर भी जब तक गद्य में लिखी कोई पुस्तक न पाई जाय तव तक बॅगहा- गद्य की प्राचीनता स्वीकार करने के लिए कोई तैयार न होगा। इसी से संस्कृत-पुस्तकों के अनुसन्धान के समय मैंने बँगला के गद्य-अन्यों की भी खोज शुरू की थी। मेरे घर में पिताजी की हस्त- उनके फूफा लिखित पुस्तकों में खोज करते-करते स्मृतिकल्पद्रुम नामक एक हस्त- लिखित गद्य-प्रन्ध मुझे प्राप्त हुआ। यह सम्पूर्ण नहीं है।

इसमें तिघिमजरी, प्रायश्चित्तम जरी, शुद्धमतरी आदि कई मञ्जरियाँ हैं। वृद्ध चाचाजी से पूछने पर मालूम हुआ कि वह पुस्तक के हाथ की लिखी है और उन्होंने यशोहर जिले से लाई गई पुस्तक से उक्त अन्य की यह कापी की थी। चाचाजी का खयाल है कि थाना- कुल के वन्द्योपाध्याय ठाकुर के वंशधरों की यह रचना है।

Part 1, Part 2 and Part 3 Link

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जैसे की आपको पता है यह कहानी छोटी नहीं है तो हमने इसे तीन हिस्सों (अंश) में विभाजित किया हुआ है तो यह इस पूरी कहानी का पहला विभाग था. आपको इसके बाकि दोनों विभाग भी हमारी Website में मिल जायेंगे या पोस्ट के निचे ही आपको लिंक दिए हुई होगी। तो आप वह क्लिक करके इसके बाकि के विभाग पढ़ सकते है.

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